हिंदी जगत

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कोठे वाली

रमेश कुमार मिश्र (लेखक) रजनी बाई औरों के साथ छज्जे पर खड़ी होकर ग्राहकों को अपने जिस्म का नूरे व्यापार करने को कभी शरीर के नाजुक अंगों को मटकाकर तो…

श्रद्धांजलि
हमने कब चाहा
ट्वायलेट गंदा है

ट्वायलेट गंदा है

भारत में आज भी सरकारी अस्पतालों के ट्वायलेट बद से बदतर हैं … रमेश कुमार मिश्र इसे विडंबना कहें या अनदेखी समझ नहीं आता कि आजादी के पचहत्तर वर्ष बाद…

वतन के लाल
सिंदूर
उद्घोष पहलगाम के
viharika poem

विहारिका

रमेश कुमार मिश्र मैं उन्मुक्त गगन की हूँ मलिका नभ विचरण है अभिसार मेरा. मैं पुण्य धरा की नवल किशोरी , है प्रकृति पुष्प श्रृंगार मेरा. मैं पुरुष हृदय की…

तलाक