दीक्षाबचपन की दोस्त आशू को समर्पित यह कविता

दीक्षा शर्मा

दीक्षा शर्मा

बचपन की अलमारी में रखा वो ख़ास खिलौना हो तुम,

मेरी हर अनकही बात का खूबसूरत बिछौना हो तुम।

स्कूल की बेंच से शुरू हुआ था ये प्यारा सा सफ़र,

जहाँ सिर्फ खिलखिलाहटें थीं और न था कल का डर।

फ़िर शादी की शहनाइयाँ बजीं, जीवन बदला और राहें,

साड़ी के पल्लू में सिमट गईं वो बेफ़िक्र निगाहें।

नया घर, नए रिश्ते और संस्कारों का वो दायरा,

पर तुम्हारे नाम पर आज भी रुक जाता है हर इशारा।

गोद में खेलते बच्चे की हर छोटी किलकारी के बीच,

और रसोई में पकती चाय की हर एक चुस्की के बीच,

मैं संभालती हूँ गृहस्थी की हर छोटी-बड़ी ज़िम्मेदारी,

पर कमज़ोर नहीं पड़ने दी हमने ये खूबसूरत यारी।

थक कर शाम को जब भी दो पल फुर्सत के पाती हूँ,

एक फोन कॉल पर तुम्हारे संग फिर वही लड़की बन जाती हूँ।

पति, बच्चा, परिवार—हर मोर्चे पर मुस्तैद खड़ी हूँ मैं,

पर दोस्ती निभाने के मामले में भी उतनी ही अड़ी हूँ मैं।

दुनिया कहती है शादी के बाद औरत बदल जाती है,

पर सच्ची दोस्ती ही तो है जो हर मोड़ पर मुस्कुराती है।

ज़िम्मेदारियाँ निभाईं दिल से, पर दोस्ती खोने न दी,

वक़्त की धूल इस पावन रिश्ते पर हमने जमने न दी।

दीक्षा शर्मा 

कवयित्री 

साहिबाबाद गाजियाबाद उत्तर प्रदेश

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