कविता

कवि

कवि

रश्मि विभा त्रिपाठी हमेशा देखती हूँ मैं हवा के हाथों में धूप की परछाईं में झील के शीशे में शिखर की अंगड़ाई में जाह्नवी के द्वारे जुन्हाई के तेज बल्बों…

महंगी महबूबा
तो बता देना
    "मै और मेरा"
असंतोष
युग परिवर्तन
ठिकाने 
पिता

पिता

डॉ सत्येन्द्र सत्यार्थी है निशा जिंदगी, जागरण हैं पिता, हर तरक्की के अंतःकरण हैं पिता। जिंदगी मुश्किलों ठोकरों से भरी, उनसे बचने का दृढ़ आवरण हैं पिता। कष्ट-ग़म के हलाहल…

ख्वाहिशें

 ख्वाहिशें

संजीव गोयल ख्वाहिशों का हमारी साँसों से है एक अटूट संबंध ख्वाहिशों के बिना हमारे जीवन में है सिर्फ क्रंदन, किसी को ख्वाहिश है नभ के शिखर को छूने की…

नारी