कविता

श्रद्धांजलि
हमने कब चाहा
वतन के लाल
सिंदूर
उद्घोष पहलगाम के
viharika poem

विहारिका

रमेश कुमार मिश्र मैं उन्मुक्त गगन की हूँ मलिका नभ विचरण है अभिसार मेरा. मैं पुण्य धरा की नवल किशोरी , है प्रकृति पुष्प श्रृंगार मेरा. मैं पुरुष हृदय की…

कवि

कवि

रश्मि विभा त्रिपाठी हमेशा देखती हूँ मैं हवा के हाथों में धूप की परछाईं में झील के शीशे में शिखर की अंगड़ाई में जाह्नवी के द्वारे जुन्हाई के तेज बल्बों…

महंगी महबूबा
तो बता देना