ग़ज़ल
बलजीत सिंह न देखो ताज को तुम दिल्लगी से! मोहब्बत की है तुमने गर किसी से हुआ अनजाने में इक क़त्ल जिससे! छुपाता फिर रहा था मुँह सभी से! जो…
बलजीत सिंह न देखो ताज को तुम दिल्लगी से! मोहब्बत की है तुमने गर किसी से हुआ अनजाने में इक क़त्ल जिससे! छुपाता फिर रहा था मुँह सभी से! जो…
रावण द्वारा ब्रहमर्षि कन्या वेदवती का तिरस्कार एवं शापित होना ठाकुर प्रसाद मिश्र श्रीमदवक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि । मृगनयनी के नयन सर को जग लाग न…