अरुणाकर पाण्डेय

किसी ने पूछा बल्कि कहा कि क्यों पढ़ा जाए साहित्य या हिंदी साहित्य ?
जो जवाब गिनाए गए वे और भी दिलचस्प थे क्योंकि जो साहित्यशास्त्र लिखा जाता था साहित्य के पक्ष में उसके बरक्स एक शास्त्र रचा जा रहा है साहित्य से दूर रहने के पक्ष में। यह साहित्य विरोधी शास्त्र लगभग अदृश्य है क्योंकि इसकी चर्चा खुल कर व्यवस्थित तरीके से नहीं होती । यह बस तमाम वातावरण और कई बातचीत में धीरे से मुँह दिखाता है,अपना असर डालता है और फिर कहीं खो जाता है । यह ठोस शब्दों में व्यक्त नहीं होता बल्कि छोटी छोटी चीजों में भोजन में नमक की तरह मौजूद रहता है ।
जो दिखता है वह यह कि साहित्य कम और साहित्यकार के विवादित बयान और उनके चुटीले अंतर्विरोध अधिक चर्चा में रहते हैं। यह मान लिया जाता है कि वे पब्लिक रिलेशन का दुरुपयोग बहुत कलात्मक होकर करते हैं लेकिन उनकी लिखी हुई अंतर्वस्तु से पाठक के मन का कोई जुड़ाव नहीं हो पाता । मसलन जैसे पहले के कोई कवि या गद्यकार को लें तो उनकी लिखी हुई रचनाओं की पंक्तियां कई अवसरों पर सुनी सुनाई जाती थीं,लेकिन आज जो बहुत स्थापित लोग माने जाते हैं अक्सर उनकी रचनाओं के नाम भी बमुश्किल ही कोई नहीं बता पाता।अर्थात साहित्यकार तो फिर भी चर्चित है लेकिन साहित्य नहीं ।मजेदार तो यह भी है कि खुद साहित्यकारों और प्रकाशकों को भी इससे कोई फर्क अब नहीं पड़ता कि इस समस्या का कोई उपचार खोजा जाए। इससे यह और मजबूत होता ही दिखता है कि साहित्य दरअसल अन्य उद्देश्यों को साधने का माध्यम है । इससे छवि का निर्माण तो होता ही है लेकिन कई बार कई तरह की सत्ताओं के साथ संबंध भी बनते हैं। आज की समझ यह कहेगी कि इसमें गलत क्या है लेकिन इसमें दरअसल जो एक बड़ा सवाल उठ रहा है वह यह कि साहित्य का अपना चरित्र बदल रहा है ।
तो यह लगभग स्थापित किया जा सकता है कि साहित्य सिर्फ लिखा जा रहा है पर लिखने वाले भी यह जरूरी नहीं समझते कि पाठक के साथ उनके लिखे का कोई स्थायी संबंध स्थापित हो ,बस उनके चेहरे जरूर स्थापित होते चले जाएँ।
ऐसी स्थिति में यह देखना भी बहुत दिलचस्प हो जाता है कि तब क्या होता है जब साहित्यकार का लिखा हुआ स्वयं उसी पर प्रश्न उठाने लग जाए। विमर्शों ने मूल्यांकन की जो प्रणाली विकसित की है उसकी दृष्टि आज उनलोगों को भी प्रश्नों के घेरे में बाँध रही है जिनका लेखन अब उनके अपने व्यवहार के विरुद्ध जा रहा है । क्या जो भी रचा गया है उसकी जिम्मेदारी केवल पाठक तक ही सीमित है या फिर लिखने वाले का भी उससे कोई नाता है।
आज का साहित्य अधिकतर एक कठघरा है जो किसी प्रवृत्ति,व्यक्ति या किसी अन्य महत्वपूर्ण अस्तित्व की आलोचना में विकसित किया जाता है । लेकिन तब क्या होता है जब प्रतिष्ठित होने के बाद लिखने वाला खुद ही उस कठघरे में खड़ा होने लायक हो जाता है पर चूंकि कठघरा उसका बनाया हुआ है तो उसमें उसे देखने की कल्पना या हिम्मत नहीं की जाती ।
इसके साथ ही पाठक को कोई भोलाभाला व्यक्ति या फैन समझकर चलना एक बड़ी भूल है । वह न केवल अपने अनुभव रखता है बल्कि मल्टीमीडिया का उपभोक्ता भी होता है जो कभी न कभी अपनी इच्छा खुद ही बनाता है । अभिप्राय यह कि उसे बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता है क्योंकि वह भी उसी दुनिया का जीव है जहां का साहित्यकार है। सोशल मीडिया पर कई तरह की भाषाओं में अपनी राय रखने वाला पाठक भी साहित्यकारों के साथ भावनात्मक खेल खेलने की क्षमता रखता है । जैसे वह सबकुछ समझता है या समझ सकता है पर एक व्यर्थता बोध के कारण समय नहीं देना चाहता । वह अधिकतर व्यक्तिगत संबंधों ,राजनीतिक कारण या तत्कालीन प्रभाव के कारण ही किसी साहित्यकार को प्रोत्साहित करता है लेकिन फिर भी उसकी रचना से जुड़े हुए अनुभव पर बहुत कम कहता है ।
इस बहुत कम कहे और बहुत अधिक अनकहे को सुनने की जरूरत है ।
लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं।
