
दारू की खुमारी में भुलाइ गयो खान- पान ।
मान सम्मान की तो बात मत कीजिए ।
साधे हैं कमान ‘काम’ हाथ लिए पुष्प बान,
शिव झूमैं भंग खाए जरा ध्यान दीजिए ,
संत वा असंतन को बाढ़्यो है विवाद आज
मिमियाते कंत हैं बेहाल देख लीजिए ।
प्रेमी के भ्रम को नीले- नीले ड्रम को,
होलिका सी कुपित प्रिया देखि हाथ मीजिए …
शुभ होली ..
लेखक हिंदी के प्रतिष्ठत लेखक हैं , प्रकाशित हिन्दी उपन्यास रद्दी के पन्ने
