ग़ज़ल
बलजीत सिंह न देखो ताज को तुम दिल्लगी से! मोहब्बत की है तुमने गर किसी से हुआ अनजाने में इक क़त्ल जिससे! छुपाता फिर रहा था मुँह सभी से! जो…
बलजीत सिंह न देखो ताज को तुम दिल्लगी से! मोहब्बत की है तुमने गर किसी से हुआ अनजाने में इक क़त्ल जिससे! छुपाता फिर रहा था मुँह सभी से! जो…
अंशुमान एस०द्विवेदी हमारे रामलला वैकुंठ में जब रामलला से मिले होंगे तो क्या बात कर रहे होंगे..? शायद बाबा रामजी से बहुत शांत आवाज़ में बात कर रहे होंगे… बिना…
अरुणाकर पाण्डेय कुछ भी तो नहीं लिखना था न कोई शब्द याद रखना था न कोई अर्थ ढूंढना था सिर्फ लेनी थी थोड़ी सी साँस पीना था थोड़ा पानी तकिए…