जातिगत आरक्षण: वक्त आ गया है, योग्यता को तराशने का

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​दीक्षा शर्मा

deeksha sharma

​भारत जब अपनी स्वतंत्रता के 100 वें वर्ष की ओर कदम बढ़ा रहा है, तब यह विचार करना आवश्यक हो गया है कि क्या हमारे समाज से और समाज की व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता है?

​दशकों पहले जब हमारे संविधान निर्माताओं ने जातिगत आरक्षण का प्रावधान दिया था, तो उनका ध्येय सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में शामिल करना था। वह एक अस्थायी व्यवस्था थी, जिसका उद्देश्य समानता स्थापित करना था। परंतु आज, इतने वर्षों बाद, इस बात पर विचार करना अनिवार्य हो गया है कि क्या जातिगत आरक्षण समाप्त कर देश को नई दिशा में ले जाने का वक्त आ गया है?

​जातिगत आरक्षण को समाप्त करने या उसके स्वरूप में बदलाव करने के पीछे कई महत्वपूर्ण सामाजिक और व्यावहारिक तर्क हैं:

​सच्ची समानता की स्थापना – आरक्षण का मूल उद्देश्य सभी को समान अवसर देना था। लेकिन जब योग्यता के स्थान पर केवल जाति के आधार पर अवसर तय होने लगते हैं, तो प्रतिभाशाली युवाओं के मन में निराशा का भाव पैदा होता है। जातिगत आरक्षण समाप्त होने से प्रतिभाशाली नागरिक को अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा।

​देश की प्रतिभा का सही उपयोग – देश के विकास के लिए यह बेहद आवश्यक है कि प्रशासनिक, शैक्षणिक, तकनीकी क्षेत्रों में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को मौका अवसर

मिले। जब अवसर केवल योग्यता और परिश्रम के आधार पर मिलेंगे, तो देश का विकास और अधिक तीव्र गति से हो पाएगा।

जातिगत दूरियों को खत्म करना – जातिगत आरक्षण की वजह से समाज में अक्सर वर्ग-संघर्ष और आपसी दूरी देखने को मिलती है। जब तक हर जगह जाति का प्रमाण मांगा जाएगा, तब तक जाति विहीन समाज का निर्माण संभव नहीं है। आरक्षण समाप्त होने से सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा मिलेगा।

आर्थिक आधार पर सहयोग की आवश्यकता – आज के दौर में जाति ही एकमात्र गरीबी का पैमाना नहीं रह गया है। हर जाति व समुदाय में ऐसे परिवार हैं, जो आर्थिक तंगी के कारण आगे नहीं बढ़ पाते। यदि व्यवस्था में बदलाव कर आर्थिक स्थिति को मदद का आधार बनाया जाए, तो वास्तव में वही व्यक्ति लाभान्वित होगा, जिसे उसकी जरूरत होगी।

​जातिगत आरक्षण को हटाने का अर्थ किसी वंचित वर्ग से उसका अधिकार छीनना नहीं है, अपितु व्यवस्था को न्यायसंगत बनाना है। सहायता केवल उन्हीं को मिलनी चाहिए, जिन्हें उसकी वास्तव में जरूरत है – चाहें वे किसी भी जाति या वर्ग के हों।

​यदि हम एक निष्पक्ष, सशक्त, समर्थ भारत का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें जाति से उठकर प्रतिभा, योग्यता और आर्थिक स्थिति को प्राथमिकता देनी ही होगी।

​दीक्षा शर्मा

7/8/20

लेखिका अध्यापिका हैं ।

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