कौड़ियों की लड़ाई में कहीं खो न जाए संस्कार के पुल की मर्यादा

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रमेश कुमार मिश्र

RAMESH KR MISHRA

संपादक की कलम से– शिक्षा जीवन में संस्कार लेकर आती है। शिक्षक उसी संस्कार को अनुशासित तरीके से प्रसारित करने वाला होता है । जहां भाषा और व्यवहार की मर्यादा दोनों का सामंजस्य होना परमावश्यक होता है। पटना के सर तो अपनी भाषा की मर्यादा ही भूल गए हैं। महिला सम्मान कहां है सर जी ? यही सिखाओगे क्या बच्चों को जिन्हें आप पढाते हो  ? कम से कम देश के वे अभिभावक जो अपने बच्चे को आपके पास पढने को भेजते हैं उनका तो ध्यान धरो मालिक । क्रोध सिर्फ शरीर को ही नुकसान नहीं पहुंचाता है अपितु अर्जित कीर्ति को भी समाप्त करता है । इस देश बुडबक और ससुरा जैसे शब्द जो बोली के हैं ने आपको सोसल मीडिया का हीरो बना दिया और आपका मोल भी बढा दिया है। आप कहां इन कौडियों में उलझे पडे हैं । स्वयं के वजन और मूल्य स्वयं के गाये के कभी वजन धारण नहीं करते हैं यह तो आपने पढा ही होगा ।

एक पत्रकार एक शिक्षक दोनों हमारे लोकतांत्रिक व्यवस्था में में जरूरी हैं। 

कैमरा बड़ा हो या छोटा हो या बडा दोनों की अपनी-अपनी अहमियत है । इंटरव्यू छोटा हो या बडा दोनों की अपनी -अपनी अहमियत होती है ।

सम्माननीया अंजना ओम कश्यप ने अगर ए कह ही दिया कि यूट्यूब के दो कौड़ी के टीचर 

तो उस पर इतना बवाल के बजाए अपने-अपने गिरेबान में झांक लेना चाहिए था। जो खुद से यह जानता कि वह दो कौडी का नहीं है तो काहे को उछल रहा है । छलकता और उछलता तो वही है जो खाली या भार रहित है। वह सुने नहीं हैं का सर जी अध जल गगरी छलकत जाए।  

कुछ लोग स्वयंभू शिक्षक का दर्जा प्राप्त करके यदि कैमरे के सामने पढ़ाई से ज्यादा टी आर पी ढूंढ रहे हैं तो माफ़ कीजिएगा ए शिक्षक तो नहीं हैं । अभिनेता या नेता बनने के लिए इनकी आत्मा तड़प रही है।

कासी ने कहीं लिखा है कि “महान वे नहीं होते जो अपनी महानता का परिचय देते हैं अपितु महान वे होते हैं जो अपनी योग्यता  से ज्यादा दूसरे की की योग्यता को सम्मान देते हैं । चाटुकार, दलाल , बिके हुए गोदी मीडिया जैसे शब्दों पर जो चुप रहकर अपना कर्तव्य निभा रहा है असल में वह पत्रकार है। 

रूस के राष्ट्रपति पुतिन का इंटरव्यू इसी अंजना ओम कश्यप ने किया था, तो कुछ स्वयं भू शिक्षकों ने अंजना की योग्यता पर सवाल उठा दिया था। यह क्या था अहंकार या नेता अभिनेता बनने की जद्दोजहद। आजकल सोशल मीडिया का जमाना है प्रसिद्धि और बदनामी दोनों एक कटोरी में साथ-साथ चल रही हैं। अंजना ओम कश्यप के समय के पत्रकारों ने सुसरा और बुड़बक कहकर टी आर पी प्राप्त नहीं किया है। इन सबने पत्रकारिकता जगत में मेहनत किया है । थाली में परोस कर पत्रकारिता में प्रसिद्धि नहीं मिलती है। जो भी शिक्षक हैं यूट्यूब पर वे भी तो अपनी रोजी रोटी के लिए ही पैसा लेते हैं । और पत्रकारिता में भी जिसने जैसी मेहनत और स्थिरता से काम किया है उसका ओहदा उतना बड़ा है। केवल 2 दूना चार कह देने से जी डी पी की परिभाषा देश भर को समझ नहीं आ जाती है । समझना चाहिए कि यदि आप में योग्यता है आप अपने आपको दो कौड़ी से ऊपर समझते हैं तो धैर्य से भाषायी मर्यादा को ध्यान में रखकर देश की महिला के प्रति सम्मान देते। एक और बात विचारणीय है यह शुरुआत पत्रकारिता जगत से नहीं हुई है । अपितु लोगों ने पत्रकारों पर‌ बहुत हमले किए हैं ‌। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर‌ सोशल मीडिया ने आंख बंदकर करके कीचड़ फेंका है । आखिर यह किस पर गिरेगा स्वयं पर । वह कहा जाता है न कि जैसा बोएंगे बीज फसल भी वैसी ही उपजेगी। जो दिन भर लोगों की योग्यता को नापता है आज सिर्फ एक बात पर स्तर हीन भाषा पर उतर आए हैं।

शिक्षक होना सिर्फ ज्ञान होने तक सीमित नहीं है। उसके लिए  उसमें  आचार,  विचार और त्याग की भावना का बलवती होना आवश्यक ‌ है। 

भाषा का प्रभाव यदि देखना है तो भारत के दो प्रमुख राजनेताओं की बात करूंगा। 

प्रथमतया श्रीमान राहुल गांधी और दूसरे हैं श्रीमान अरविंद केजरीवाल जी । ऐसा नहीं कि ए देश द्रोही हैं । इन सबका योगदान भारतीय राजनीति में है और जब तक इनका जीवन रहेगा भारतीय राजनीति को इन सब का योगदान मिलता रहेगा। लेकिन इन दोनों की भाषा कई बार इतनी खराब रही कि इन्हें माननीय न्यायालय में सफाई देनी पड़ी या माफी मांगना पड़ा।  और आप यकीन मानिए कि इसका दुष्प्रभाव इनकी राजनीति की सफलता और असफलता पर भी खूब पड़ा है।

सर जी समझिए। कम से कम आप तो शिक्षक हैं आपकी भाषा की मर्यादा बनी रहे यह कोशिश कीजिए । प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालयों तक जो शिक्षक पढ़ाते हैं वे शिक्षक के बारे में क्या सोचेंगे समझिए और अपनी गरिमा के साथ बोलिए । और लोग समझें न समझें कम से कम आपके द्वारा पढ़ाए जाने वाले बच्चे सीखेंगे भाषा की मर्यादा। 

शोहरत मिलना आसान है धन कमाना आसान है जो मुश्किल है वह यह कि जो मिला है वह संभला रहे । 

 कहते  साधु ! भाषा की मर्यादा का कोई नहीं है सानी । 

बिगड़े बोल वही बोलता  मरा जिसके आंख का पानी ।।

शिक्षा एक संस्कार है विचार है आचार है जो हमें व्यभिचार से रोकती है । इसलिए शिक्षित बनें  स्वयं प्रकाशित हों औरों को भी प्रकाशित करें । क्या रखा इन कौड़ियों में ? 

सदा न रही मृत्युलोक में साख किसी की।

यश केवल गाया जाता है ।

जिसने जैसा बोया बीज भूमि में वह वैसा ही फल खाता है।

शिक्षक है अनमोल जगत में जो त्रिभुवन में पूजा जाता है ।

पत्रकार भी कुछ कम तो नहीं जो जगत काम में आता है।

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली से हिंदी में परास्नातक और हिंदी पत्रकारिता में डिप्लोमा हैं ।

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