
अरुणाकर पाण्डेय – साधारण परिवार से आए हुए कलाकार जब सफल हो जाते हैं तब वे अक्सर एक सपना देखते है कि वे अपनी खुद की फिल्म बनाएंगे। हिंदी सिनेमा में अपनी सशक्त पहचान बना चुके राजपाल यादव ने भी जब अपने पैर जमा लिए तब उन्होंने भी यही सपना देखा । उन्होंने 2010 में एक फिल्म बनाई अता पता लापता। इस फिल्म के लिए उन्होंने पाँच करोड़ रुपए का कर्ज लिया लेकिन वह बुरी तरह पिट गई जिससे उनके कर्ज की राशि अब नौ करोड़ तक हो गई। उनके चेक बाउंस होने के कारण उन पर आपराधिक मामला चला जिसके कारण वे आज फिर तिहाड़ पहुंच गए और बेबस हो चुके हैं।
अभिनय बहुत सूक्ष्म कला है जिसके प्रदर्शन में ऑडियंस को अपना लोहा मनवाना आसान नहीं होता जबकि विशेषकर आप हीरो नहीं होकर एक कॉमेडियन हों। इस परीक्षा को राजपाल ने कभी पास कर दिखलाया था और कई वर्षों के अथक परिश्रम से अपनी जगह उन्होंने बनाई थी। संभवतः सबसे यादगार रोल उन्होंने मैं मेरी पत्नी और वो तथा हेलो,हम लल्लन बोल रहे हैं जैसी फिल्मों में निभाई । बाकी अधिकतर जगहों पर जैसा कि होता है,इंडस्ट्री ने जैसे उनका इस्तेमाल ही किया । कमाल की बात है कि इन फिल्मों में वे कॉमेडियन नहीं बल्कि केंद्रीय किरदार निभाते नजर आए। इससे यह साफ होता है कि वे अपने अभिनय की कला का मूल्य समझते थे और उसके दम पर कुछ अलग करके दिखाना चाहते थे ।
हर कलाकार का यह सपना होता है कि एक दिन वह अपनी तरह से और अपनी तरह की चीज बनाएगा क्योंकि बिना उसके वह अपने अंदर की भूख को नहीं मिटा सकता। राजपाल यादव के पहले भी कई मशहूर कलाकारों ने ऐसा किया जिसमें गीतकार शैलेन्द्र और स्वयं अमिताभ बच्चन के उदाहरण देखे जा सकते हैं। तीसरी कसम ने शैलेन्द्र का सपना तो पूरा किया लेकिन उन्हें भीतर से तोड़ कर रख दिया । अमिताभ बच्चन ने भी कंपनी बनाई पर जब घाटा हुआ तो उन्होंने अभिनय से ही खुद को न केवल उबारा बल्कि फिर से अपनी जगह बना ली जो आज तक बनी हुई है । लेकिन ऐसे वापसी कितने लोग कर पाते हैं। इन दिनों एक बड़ा उदाहरण गोविंदा का भी देखने को मिलता है जो बहुत चर्चित है।
अच्छी खबर यह है कि सोनू सूद और तेज प्रताप यादव ने आगे बढ़कर अपनी मदद की पेशकश की है । यह भी उम्मीद है कि वे जल्दी ही तिहाड़ से जमानत पर बाहर आ जाएंगे। लेकिन यह पूरी घटना उन कलाकारों के लिए निराशाजनक ही है जो अपनी तरह से अपनी फिल्मों में प्रयोग कर कुछ नया करना चाहते हैं। वैसे भी हिन्दी सिनेमा के कई कलाकार पिछले वर्षों में बड़ी असफलताओं और स्वास्थ्य कारणों से स्क्रीन को सूना कर गए हैं।
एक उम्दा कलाकार कभी खत्म नहीं होता,बल्कि वह अपने कलात्मक प्रयोगों के लिए जिंदा रहता है। वह अगर लंबे समय से सक्रिय न भी हो तो भी मन यह कहता है कि वह फिर कुछ अनूठा ले कर जरूर आएगा जो आनंद भी देगा और चमत्कृत भी करेगा। शायद आगे भी कभी ऐसा हो।लेकिन जब भी ऐसे समाचार मिलते हैं तब फिर यही बोध गहरा जाता है कि चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुं देस !
लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं।
