अरुणाकर पाण्डेय

कुछ भी तो नहीं लिखना था
न कोई शब्द याद रखना था
न कोई अर्थ ढूंढना था
सिर्फ लेनी थी थोड़ी सी साँस
पीना था थोड़ा पानी
तकिए की नरमी पर सिर रखकर
एक भरपूर नींद लेनी थी
सुबह करनी थी एक सैर
नंगे पैर मिट्टी,बालू या रेत पर
बतियाना था एक बहुत पुराने
दोस्त से बिना किसी स्वार्थ के घंटों
प्रेम करना सीखना और जानना था
झूठे बर्तन धोने थे
घर साफ करना था
खेलना था बिटिया के साथ
किसी एक दुपहरी
एक बीड़ा पान जमाना था
मजा सिर्फ यह नहीं कि
यह सब नहीं हो सका बल्कि यह
कि इनके न होने के बावजूद
कुछ भी नहीं लिखा गया
शब्द और अर्थ चूकते ही रहे
और शब्दार्थों सहितो काव्यम्
सिद्ध न हो सका ।
एक इतिहास साहित्य का नहीं
बल्कि साहित्य न होने का भी
लिखा जाना जरूरी लगता है !
लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं।
