अरुणाकर पाण्डेय

एक अजीब बात हुई ! एक मित्र से एक अन्य मित्र के बारे में पूछा तो उन्होंने उनके बारे में बताने से साफ़ मना कर दिया | ये दोनों ही मुझे कई वर्षों से जानते हैं लेकिन जब तब वो सज्जन जिनसे पूछा था, वे अपनी पोजीशन जताने में थोड़ा भी परहेज नहीं करते |गर्व करते हैं|कभी कभी नहीं हर समय करते हैं |मेरी विडम्बना यह है कि मैं उनके मुँह पर हँसना नहीं चाहता क्योंकि इससे बात का बतंगड़ बन सकता है |हालाँकि किसी और से उस मित्र का सम्पर्क मुझे मिल गया और मेरा काम भी हो गया |लेकिन रह रह कर जब भी मुझे उन सज्जन के कभी दर्शन होते हैं तो वह बात याद आ जाती है |
वे सज्जन मूलतः क्लर्क हैं पर शायद बड़े काम के क्लर्क हैं |इसलिए यदा कदा अपनी उपस्थिति दर्ज करते रहते हैं | पर उन पर दया भी बहुत आती है |ऐसा अनुमान लगाता हूँ कि कभी अन्य युवाओं की तरह उन्होंने भी बहुत बड़ा आदमी बनने का सपना देखा होगा |लेकिन बात बनी नहीं |भीतर का काल्पनिक अधिकारी छलांग मारता होगा लेकिन बाहर का सत्ताविहीन यथार्थ उसे तोड़ देता होगा | बेबस आदमी करे तो करे क्या ? बहुत करे तो सत्ता से सम्बन्ध बना लेगा और अपने को समझा लेगा कि वह भी सत्ता का हिस्सा है |मगर सत्ता तो सत्ता होती है ! वह तो इस्तेमाल करेगी,पुचकारेगी और एक कप चाय-बिस्कुट खिला कर भेज देगी |इन्हें लगेगा कि ये इस्तेमाल कर रहे हैं पर वो इस्तेमाल कर लेगी | एक दिन जब उसे कोई और मिल जाएगा तो धीरे से चाय पिलाना और पूछना छोड़ देगी और ये बेचारे अपनी अकड़ और काबिलियत लिए एक टेबल से अगली टेबल तक पहुँच जाएंगे |सब मिलाकर यह कि पंछी जहाज पर लौटता रहेगा, हमेशा कुंठित रहेगा और यह उसे पता ही नहीं लगेगा कि लोग उसके कितने मजे ले रहे हैं |
पर जब उनकी याद आती है तो ऐसे अन्य अनगिनत लोगों की भी याद आती है जो विनम्रता के साथ अपना स्वभाव खुशनुमा बना कर रखते हैं |काम की अपनी मेरिट होती है, हो सकता है कि वह किसी अन्य कारण से न भी हो|लेकिन सही दिशा निर्देश देने और अच्छा व्यवहार करने वाले लोगों से किसी भी संकटकालीन परिस्थिति में विश्वास बना रहता है |अपनी चूक समझ आ जाए तो भी मन भारी नहीं होता |बात समझ आ जाती है तो निदान मिल जाते हैं |
इन दिनों एक दिन में सैकड़ों रीलें आती हैं जहाँ दो अधिकारी या नेता फोन पर टकराते दिखते हैं |उनमें घमंड की जो टकराहट शुरू होती है,वह अक्सर भाषा के भ्रष्टतम और आक्रोशित रूप में बहती दिखती है |कई बार तो यह भी होता है कि घमंड हाथापाई में तब्दील होता है और रील का अंत हो जाता है |इसके बाद जो कमेंट्स पढ़ने को मिलते हैं वो स्पष्ट संकेत देते हैं कि वह यथार्थ के बजाए मनोरंजन का रील बन कर रह जाती है और हमेशा के लिए दर्ज हो जाती है |पर बहुत बारीकी से वह रील यह काम करती है कि जन प्रतिनिधि या सेवक के प्रति एक भय का निर्माण करती है जिससे लोकतांत्रिकता की प्रक्रिया पर अंतर पड़ता है |अतः इसके लिए भी अब प्रशिक्षण या आचार संहिता बना कर लागू करने के दिन आ गए हैं अन्यथा इन सबसे भाषा का जो नुकसान हो रहा है,उसका सौन्दर्य और शालीनता भंग हो रहे हैं, वह एक बहुत बड़ी सामाजिक क्षति है |
इन लोगों के बरक्स निजी क्षेत्रों ने इस मामले में अपने को एडजस्ट कर लिया है क्योंकि वहाँ प्रोफेशनल होने की बाध्यता अधिक है |वे भीतर से घोर असहमत हों तब भी वे अपनी बात शालीनतापूर्वक रखते हैं जिससे सामने वाले को असहमत होते हुए भी उन पर हिंसात्मक होने का अवसर नहीं मिलता | यहाँ भी अनायास ही ध्यान उन रीलों की ओर चला जाता है जिनमें एयरलाइन्स में यात्रियों का आपा खोने के बावजूद कर्मचारी शालीनता से अपनी आचार संहिता के दायरे में व्यवहार करते नजर आते हैं |अपने पर नियंत्रण सीख कर रखने वाले तो पार हो जाते हैं लेकिन जघन्यता का परिचय देने वाले बाद में बहुत अधिक कीमत चुका कर तब समझते हैं |आज से पाँच सौ वर्ष पहले कबीरदास ने कहा था
“ऐसी बाणी बोलिए, मन का आपा खोए
औरन को सीतल करे,आपहूँ सीतल होए”
विचित्र बात यह है कि कबीर को अक्खड़ और खरा माना जाता है जिसने अपने समय में सबकी खबर ली | लेकिन जब इस दोहे पर विचार करता हूँ तो सोच में पड़ जाता हूँ कि शीतलता का ऐसा सामाजिक मन्त्र देने वाला व्यक्ति इतना अक्खड़ क्यों माना जाता है | कबीर को लेकर मंथन चलता रहेगा लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि वाणी में शीतलता का जो सन्देश उन्होंने दिया है,वास्तव में वह आज की परिस्थिति में बेहद प्रासंगिक हो चला है | इसमें खुद को ठंडक देने पर जो जोर है वह बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक औषधि है क्योंकि यह इस बात की परिचायक है कि मन पर नियंत्रण पा लिया गया है |
लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं।
