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संपादकीय टिप्पणाी— रचना के सागर में असंख्य रचानाएं प्रसंगिक बनकर मानव समाज को नित नई दिशा उर्जा और समाधान भी देती रहती हैं । इस क्रम में प्रति दिन अनेक रचाओं का सृजन भी अनेक रचनाकारों की लेखनी से मां वीणावादिनी की असीम अनुकंपा से होता रहती हैं । रचना की प्रासंगिकता के मू्ल्य उस रचना में छुपे दृष्टिबद्ध शब्दों के भावों की गहराई में अंतर्निहित होता है । डा .अरुणाकर पाण्डेय जी की यह कविता भी समाज और व्यक्ति के बीच के जटिल संबंध को बड़ी बारीकी से दर्शाती है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे सरपरस्ती और सही मार्गदर्शन के अभाव में व्यक्ति अपनी जड़ों से कटकर उपभोक्तावादी संस्कृति का शिकार हो जाता है। यह कविता एक तीखा व्यंग्य है उन सामाजिक और आर्थिक ढाँचों पर जो मनुष्य की सहज मानवीय भावनाओं को भी एक वस्तु में बदल देते हैं, जिसे खरीदने के लिए वह अपनी पहचान तक बेचने को तैयार हो जाता है। यह एक गंभीर चेतावनी है कि यदि हम अपनी रचनात्मकता, मानवीयता और सांस्कृतिक विरासत को नहीं सँभालेंगे, तो हम एक ऐसे समाज में ढकेल दिए जाएँगे जहाँ सब कुछ बिकाऊ होगा, और सहज मानवीय मूल्य बेमानी हो जाएँगे….

डा. अरुणाकर पाण्डेय

अरुणाकर पाण्डेय

कहीं बहुत दूर…

जैसे अनाथ बच्चे

धीरे धीरे बिना परिवार के 

माहौल दिए प्रेम और पुचकार के अभाव में 

अक्सर खूंखार और बेलगाम हो 

जाते हैं वैसे ही 

एक उम्दा रचनाकार 

की सरपरस्ती के बिना जनता 

और पाठक भी गुम हो जाते हैं 

तब हर जगह हर समय 

लगातार  अघोषित और 

असमानता से भरपूर युद्ध चलते 

रहते हैं जिसका परिणाम अक्सर 

उन तिकड़मों के पक्ष में दिखाया 

जाता है जो इन अनाथों की कमजोरी पर लगातार वार करते हुए 

उन्हें उड़ा ले जाते हैं ।

उड़े हुए लोग पढ़ना भूल जाते हैं 

वे हँसना और मुस्कुराना भूल जाते हैं 

वे गुनगुनाना और थिरकना भी भूल जाते हैं 

वे मान जाते हैं बड़ी आसानी से 

बिना कोई विरोध किए कि 

इन सभी नैसर्गिक और मानवीय क्रियाओं को अब सहजता से 

प्राप्त नहीं किया जा सकता 

और एक अच्छी कीमत देकर 

स्टेटस के साथ 

खरीदना ही पड़ता है ।

इसलिए सबकुछ खरीदने के लिए 

वह चौबीस घंटे बिकने को तैयार 

रहता है अपने भीतर के उस 

इतिहास और किस्से- कहानियों को भुलाए जहां 

उसकी गुत्थियों के सूत्र मौजूद 

हो सकते हैं ।

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं।

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