मशीनी शब्दों की बाजीगरी या संवेदनाओं का अंत…? 

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दिल्ली में सजी AI की महफ़िल लेकिन क्या मनुष्य मस्तिष्क की घनीभूत पीड़ा को व्यक्त कर पाएंगा मशीन का दिमाग.

टीम कहानीतक–जब सोचने लगेंगी मशीनें तो क्या इंसानों के मनोभावों को व्यक्त कर पाएंगी…? दिल्ली के भारत मंडपम में ए आई की महफ़िल सजी हुई है, दुनिया के दिग्गजों का है जमावड़ा…है कहा जा रहा है कि अब मशीनें सोचेंगी  भी समझेंगी भी सुख दुःख में डूबे मानव मनोभावों को भी लिखेंगी, यांत्रिकी के विकास व विस्तार की जो कहानी है  क्या मनुष्य  दिमाग पर उसका कब्जा है या मनुष्य का दिमाग मशीनों को संचालित कर रहा है… कहानीतक का सवाल यही है कि मशीन की वह कौन सी एल्गोरिदम है जो एक माँ का बेटे के प्रति स्नेह की अनुभूति के मर्म को समझकर किसी कविता किसी कहानी या किसी चुटकुले में व्यक्त करेगा क्या…? सवाल फिर वही कि नि: संदेह तकनीक जरूरी है लेकिन उस रचनात्मकता की आत्मा का क्या… जो घनीभूत पीड़ा के रूप में कविता की अजस्र धारा बनकर मानव मन में अपनी छाप छोड़ जाती है… यहाँ हमें यह भी मानना होगा कि हमारे जीवन में बहुत तेजी से मशीनी बदलाव होते चले जा रहे हैं… लेकिन हमें  यह भी याद रखना है कि मनुष्य होने के मायने क्या हैं… अब मशीन और मानव इन दोनों के बीच के बारीक अंतर को एक आम आदमी कैसे समझे यह सवाल बड़ा है… सोचिएगा…?

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