उग्र जी की कहानी सोसायटी ऑफ़ डेविल्स में खोया हुआ बनारस 

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डा. अरुणाकर पाण्डेय

Arunakar pandey

लगभग सौ साल पहले की एक दिलचस्प कहानी है सोसायटी ऑफ़ डेविल्स जिसे लिखा था पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र ने। इस कहानी में अपने समय  के बनारस कई सांस्कृतिक उल्लेख मिलते हैं जो आज के बनारस के नीचे दबे हुए बनारस की झलक देते हैं। इसमें कुछ जगहों का जिक्र आता है जो आज भी देखे या खोजे जा सकते हैं,कुछ खाने की चीजों का पता चलता है और इसके साथ ही उस समय की बनारसी बोली की अंग्रेजीनुमा हिंदी से एक मजेदार टकराहट भी पढ़ने को मिलती है ।

ऐसा माना जाता है कि यह कहानी दरअसल उग्र जी की संस्मरणात्मक कहानी है जिसमें यह दिखाया गया है कि अंग्रेज सरकार के अफसर कैसे भारतीयों को प्रताड़ित करते थे और कैसे भारतीय लोग इसका प्रतिकार अपनी निडरता और सूझबूझ से करते थे । संक्षेप में यह कहानी कुछ इस प्रकार है कि एक ट्रेन में एक गुप्त क्रांतिकारी  कहानीकार अपने सहायक के साथ यात्रा करता है तो,एक अंग्रेज अफसर से उसके सहायक की बुरी तरह ठन जाती है । जब वह अंग्रेज अफसर उससे मुँह की खाता है तब मुगलसराय उतरने के बाद उन दोनों  के पीछे जासूस लगा देता है। ये दोनों अपनी शैतान मंडली अर्थात सोसायटी ऑफ डेविल्स के साथ मिलकर उस जासूस को बनारस में छकाते हैं। इसी क्रम में वे लोग न केवल नौका विहार करते हैं बल्कि गलियों में घूमते हुए विविध स्थलों पर  विविध व्यंजनों का आनंद लेते हैं जिससे सौ साल पुराना बनारस पाठक के मन में जीवंत हो उठता है । कहानी पाठक को उस बनारस में ले जाती है जो आज कहीं भीतर खो सा गया है और पिछली पीढ़ियों के जाने  के साथ ही जैसे उसमें बड़ा परिवर्तन आ गया है।जासूस को अच्छी तरह जासूसी का स्वाद दिलाने के बाद यह स्थापित करती है कि अंग्रेजों के अत्याचार के बावजूद क्रांतिकारियों के मन कभी बुझे नहीं बल्कि वे उत्साह के साथ उनकी प्रताड़नाओं को अपनी समझ बूझ से चुनौती देते गए।

इस कहानी का एक प्रसंग है जिसमें अंग्रेज अफसर अपनी अंग्रेजीनुमा हिंदी में कहानी के नायक के भोजपुरी सहायक पीटर से झड़प होती है । एक छोटी सी कल्पना जीवंत हो उठती है कि जब लोकल बनारसी अंग्रेज अफसर से भिड़ा तो भाषा कैसे अपना स्वरूप प्रकट करती है । एक बानगी देखिए 

साहब जितने ही लाल पीले होते ,पीटर उतना ही हँसता। उसने सुन रखा था कि गोरे हर वक़्त शराब के नशे में चूर रहते ,इसीलिए उसने इस साहब को भी मदहोश समझा । वह कहने लगा- ” सूत जा,सूत जा ।तोहार होश ठेकाने नाहीं हौ । मत हल्ला करS। हमरे मालिक क ऊंघाई खुल जाई त बिगड़िहैं ।”

अंग्रेजी बोलना बेकार समझकर साहब ने लंगड़ी हिन्दी की शरण ली, ” यू शूआर !”

पीटर -” देख,सूअर – ऊअर मत कहे, नाहीं त कही देत हई। आपन मुँह नाहीं देखतन बनरे के …”

साहब – ” तुम इस गाड़ी में काहे आया ?”

पीटर – ” तू काहे अइलS? पइसा देहली तब अइली। केहू के बाप का साझा।”

साहब – बाहर निकल जाओ! गाधा।”

पीटर – ” कहथई सूत जा। पी के बौरा मत; गदहा बनैब त लात खा जाबS।”

उग्र जी की बनारसी जितनी जीवंत है उतना ही उम्दा उनका स्वरों को बांधने का लिपि उपयोग है । जैसे शब्दों के साथ ध्वनि को भी संजोने की कला अपने उत्कर्ष पर हो । कोई बनारसी की ध्वनियों और मिजाज को अगर खो भी दे तो ऐसी कहानियों और रचनाओं में उसे पाया जा सकता है । यह बोली आज भी उन पुराने बनारसियों की याद ताजा करती है जो अब के ग्लोबल भाषिक संस्करण के नीचे अब दब गई है। अगर वह बची भी है तो नई ग्लोबल पीढ़ी की बनारसी से अलग थलग ही होगी क्योंकि सांस्कृतिक प्रवाहों के कारण ऐसा संभव है ।

इसी झड़प के कारण अंग्रेज अफसर का अहम आसमान चढ़ जाता है और वह इनलोगों के पीछे अपना एक जासूस लगा देता है। ये लोग समझ जाते हैं कि जासूस इन पर नजर रखे हुए है,इसलिए वे भी मन ही मन उसे छकाने की योजना बना लेते हैं। ये लोग जब ट्रेन से मुगलसराय उतरते हैं तब यह जासूस भी उनसे उनका नाम पता जानने की बहुत कोशिश करता है लेकिन अब बेकार। तब ये लोग बनारस के दशाश्वमेध आते हैं और यहीं से कहानी में तत्कालीन बनारस की कल्पना पाठक के मन में सजीव होने लगती है ।उनके डेविल्स सोसाइटी की नाँव मानमंदिर पर लग गई जिसमें वे अन्य डेविल्स के साथ जासूस सहित सवार हो गए।

उस समय जब डेविल्स सोसाइटी के  लोगों ने इनसे जासूस के बारे में पूछा तब जो जवाब दिया वह कूटभाषा का एक मजेदार उदाहरण  है –

“जांडलू सूंडलू संडलू। हंडलू मांडलू रेंडलू पिंडलू छेंडलू पंडलू  डांडलू हैंड । (जासूस हमारे पीछे पड़ा है)”

इस सूचना के बाद जासूस को भांग छनवाने और निपटने का बहाना बनाकर गंगा पार घंटों जाने का प्रलोभन दिया जाता है । मना करने के बावजूद जासूस महोदय को भांग  छनवाकर बेसुध कर दिया जाता है और वहीं छोड़ देना चाहते हैं लेकिन  वे जब गिड़गिड़ाने लगते हैं तो वहां बनारस जाते समय बड़ी दुर्गति के साथ उन्हें नांव पर ले लिया जाता है । तब जाकर वे यह स्वीकार करते हैं कि वे दस वर्षों से अंग्रेज सरकार के खुफिया विभाग में नौकरी करते हैं और अपने आर्थिक शोषण की बात भी करते हैं।

इसके बाद इस कहानी में उग्र जी ने काशी के स्वाद का जो जिक्र किया है वह स्थान विशेष के बोध के कारण बहुत सशक्त बिम्ब बनाता है । नाँव से उतरने के बाद सीधे डेढ़सी के पुल का जिक्र आता है जो कल्पना में उस समय के बनारस का  खोया हुआ चित्र मन में बनाता है। वहीं पर जासूस से भूख के बारे में पूछा जाता है जो उसे ललचा कर दरअसल तड़पाने और लूटने का जरिया है। डेढ़सी के पुल वाले बाजार के इलाके में जब उससे इमरती और रसगुल्ले खाने के बारे में कहते हैं तो वह भीतर ही भीतर मचल जाता है। इसके बाद कचौड़ियों के लिए भी उसे छकाया जाता है और इस सब का मूल्य उस समय का पांच रुपए बनता है। फिर डेविल सोसायटी का एक शैतान जासूस को हलवाई की दूकान पर रुपए लाने का बहाना करके चंपत हो जाता है। इसके बाद ये शैतान मेंबर ब्रह्मनाल पर एक मित्र के घर पर एकत्रित हो जासूस का मजा लेते हुए जमकर कचौड़ी और मिठाई का सेवन करते हैं। यह मोहल्ला भी आज बनारस में मौजूद  है बल्कि हिंदी के आलोचक आचार्य  विश्वनाथ प्रसाद मिश्र जी का आवास रहा है। 

अंत में उग्र जी बताते हैं कि तीन दिनों के बाद वह जासूस उनलोगों को चौक पर मिला। उस समय भी उसने अपनी आगे की दुर्गति बताई। इस पर जब नायक ने उसे पान खाने का न्यौता दिया तब वह तुरंत यह कह कर निकल लिया कि अब दया कीजिए क्योंकि मिठाइयों का स्वाद वह चख चुका है,अब पान से अपनी दुर्गति नहीं करना चाहता। लेकिन फिर यहां बनारस में पान खाने की परंपरा और उस जमाने के चौक की तस्वीर पुनः सजीव हो उठते हैं ।

कहानी तो कल्पना है लेकिन इसमें आई हुई जगहों,संवादों में प्रयुक्त भाषा और खानपान की वस्तुएँ वास्तविक हैं। पर जब भी बनारस की यात्रा होगी तो मन में इन जगहों को देखते,भाषा सुनते या व्यंजनों का आनंद लेते हुए यदि इस कहानी का घटनाक्रम याद रह जाए तो शायद यह प्रतीति हो कि उस छिपे दबे बनारस को पकड़ने की या छूने की कोशिश की जा रही है जो इस कहानी में मौजूद था और हम साहित्य के रास्ते उसके साक्षी बन रहे हैं ।

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं।

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