डा. अरुणाकर पाण्डेय

किसी विचारधारा के
सांचे में ना ढाल सके जाने वाले
सांस्कृतिकर्मी,भाषा सेवी
और प्रचारक
अक्सर उस नोटिस की तरह
भटकते रहते हैं जिन्हें कोई
लेना नहीं चाहता क्योंकि
वे उपजाऊ या कारगर नहीं होते ।
एक दिशा और एक समय में
श्रम करने के बाद जब उन्होंने
दी होती है एक जमीन पूरे समाज को तब एक दिन
उनका खुद ही अनाथ
हो जाना एक सूखती हुई नदी की
तरह तय होता है
जिसे बस कहीं बहुत पीछे मजबूत होते रेगिस्तान में गुम हो
जाना होता है ।
जब इतिहास निर्धारित होने के बाद
राजनीतिक रूप से कारगर नहीं
रह जाता तब कभी भूले-भटके इनके नाम याद किए जाते हैं
एक कमाऊ धार
पैदा करने के लिए ।
तब वे शक की नजर से देखे जाते हैं
और तत्कालीन उपस्थितियों में
आंके जाते हैं उस अतिरिक्त की तरह
जिसकी भर्त्सना से फिर
इतिहास,अवसर और सत्ता का बाजार पैदा होता है ।
उनका तर्पण नहीं किया जा सकता
क्योंकि वे हाशिए के विरुद्ध
हमेशा ही फिट होते हैं
एक फॉर्मूले की तरह !
लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं।
