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ठाकुर प्रसाद मिश्र

दारू की खुमारी में भुलाइ गयो खान- पान ।

मान सम्मान की तो बात मत कीजिए ।

साधे हैं कमान ‘काम’ हाथ लिए पुष्प बान, 

शिव झूमैं भंग खाए जरा ध्यान दीजिए ,

संत वा असंतन को बाढ़्यो है विवाद आज

मिमियाते कंत हैं बेहाल देख लीजिए ।

प्रेमी के भ्रम को नीले- नीले ड्रम को,

होलिका सी कुपित प्रिया देखि हाथ मीजिए …

शुभ होली ..

लेखक हिंदी के प्रतिष्ठत लेखक हैं , प्रकाशित हिन्दी उपन्यास रद्दी के पन्ने

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