
टीम कहानीतक.काम— भारतीय राजनीति की धुरी भारतीय संस्कृति के चारों तरफ घूमती है । बदलते राजनीतिक संदर्भ में अब किसी भी व्यक्ति या दल को भारतीय राजनीति में अपनी पकड़ बनाकर रखना है तो उन सबको हिंदी, हिंदू, सनातन धर्म और सवर्णों का सम्मान करना ही पडेगा । भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण काल में अब राजनीति करनी है तो हिंदी और हिंदू का विरोध नहीं चलेगा साथ – साथ हजारों वर्षों से चली आ रही सनातन परंपरा को अपमानित करने वाले लोग भी अब सत्ता की कुर्सी पर ज्यादा दिन काबिज नहीं रह पाएंगे।
भारत में यदि राजनीति करनी है कि और सत्ता में बने रहना है तो फिर हिंदी, हिंदू, सनातन धर्म के सम्मान के साथ भारत में सवर्णों को भी सम्मान देना होगा । भारत में सवर्णों को लेकर सरकारी आंकड़े जो भी हों लेकिन भारतीय राजनीति में सवर्णों को नकार कर सत्ता पर काबिज नहीं रहा जा सकता है।
सवर्ण के बिना भारतीय संस्कृति और परंपरा को जीवित रख पाना असंभव है। राजनीतिक लाभ के बहाने यदि अब कोई दल सवर्णों को नीचा दिखाकर या धमका कर अपनी राजनीतिक मंशा की पूर्ति चाहता है तो वह कतई संभव नहीं है ।
राजनीतिक लाभ के चलते शैक्षणिक संस्थानों में यदि समरसता का माहौल खराब करके यदि कोई सत्ता में बने रहने की मंशा से कार्य कर रहा है तो वह भी जल्दी ही सत्ता से बेदखल हो सकता है।
भारतीय संस्कृति उदार चरित्र की वाहक है। यहां सभी धर्मों और जातियों का सम्मान है । लेकिन तुष्टीकरण का जबाब तो सिर्फ एक है सत्ता से उखाड़ फेंकना । इसके परिणाम सामने आने शुरू हो चुके हैं ।
स्तालिन का सत्ता से जाना तभी तयं हो गया ता जब कि उन्होंने हिंदी के विरोध के साथ सनातन धर्म का अपमान करना शुरू कर दिया था । पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीतिक पकड तभी ढीली होनी शुरू हो गयी थी जबकि उन्होंने कुछ वर्ग विशेष का ही पृष्ठ पोषण कर दियी था । पश्चिम बंगाल में भाजपा की बंपर जीत का श्रेय वहां की जनता को जाता है । कारण कि जनता ममता सरकार के तुष्टीकरण से खुश नहीं थी । कांग्रेस ने तो जैसे कसम ही खा रखी है कि हम राज्य दर राज्य अपने कमजोर नेतृत्व के चलते हारते जाएंगे । और फिर दस जनपथ पर अपनी हार का जश्न भी मनाएंगे ।
समस्त विजयी दलों को टीम कहानीतक की तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं ।
