
सोना चढ़ा कसौटी पर अब अपनी चमक दिखाएगा।
शस्त्र, शास्त्र जिन हाथों में, क्यों भाग्य हीन कहलाएगा?
अब तक थे उदार निद्रा में, त्याग मूर्ति मन भावन थे।
अपनी धरती भले थी प्यासी, पर परहित के सावन थे।
उदर धर्म तक जो सीमित हैं कल क्या हो कुछ भान नहीं?
काल, कर्म, गति, पौरुष पोषण का है जिनको ज्ञान नहीं।
नील सियारों की टोली से, शार्दूल शावक भय खाए ।
परसुराम, श्रीराम, कृष्ण के, नाहक फिर वंशज कहलाए।
जाग उठा सौभाग्य आपका, अब प्रमाद को दूर भगाओ।
एक जुट अब सबर्ण हो जाओ, अपनी ध्वजा स्वयं लहराओ।
समय प्रबोधी बनकर आया फिर अपना पौरुष दिखलाओ।
जिन आंखों पर पड़ा है पर्दा उसको खोलो राह दिखाओ।
सिंह सदा वन का रक्षक है कायर मृग बस भगना जाने।
जहां दिखाई दे हरियाली वही क्षेत्र बस अपना मानें।
शिर,भुज ,उदर जिधर चाहेंगे, वहां पांव को चलना होगा।
लक्ष्य अगर हासिल करना है ,तो लपटों में जलना होगा।
जिसने प्रतिमा गढ़ी देश की, फिर निज गौरव पाएगा।
तब मृगेंद्र का भीषण गर्जन वन में शान्ति ले आएगा।
रचनाकार – ठाकुर प्रसाद मिश्र
कवि /लेखक
प्रकाशित हिंदी उपन्यास रद्दी के पन्ने
