अरुणाकर पांडेय

बात उन दिनों की है जब अमिताभ बच्चन आनंद फिल्म के लिए अपने अभिनय की तैयारी कर रहे थे । उन्होंने खुद बताया है कि उस समय देश भर में राजेश खन्ना और उनके बाद शशि कपूर की लोकप्रियता का कोई जवाब नहीं था । तब राजेश खन्ना के साथ काम करने में ही किसी का नाम अपने आप प्रसिद्ध हो जाता था । यहां तक कि उस समय खुद अमिताभ राजेश खन्ना को देखने भर के लिए कई स्टूडियो के चक्कर लगाते थे। शशि कपूर जुहू बीच पर जब सुबह टहलने जाते थे तब वे उन्हें भी बहुत छिप कर देखने जाते थे । जाहिर है कि ये सिर्फ किसी फैन की दृष्टि नहीं थी बल्कि एक स्टार की आभा को देखने,समझने और निश्चय ही उसे सीखने की ललक से जाते रहे होंगे।अमिताभ बच्चन ने ये बातें खुद तब कही हैं जब वे इन दोनों से भी अधिक लोकप्रिय होकर दुनिया में प्रतिष्ठित हो गए थे ।
लेकिन एक अभिनेता की दृष्टि से बात तब शुरू होती है जब वे हृषिकेश मुखर्जी की आनंद फिल्म में राजेश खन्ना के साथ काम करने वाले थे । वे उन्हें काफी समय से देख पढ़ और समझ रहे थे लेकिन अब बारी थी उनके साथ और उनके सामने अभिनय करने की। वे क्लाइमेक्स सीन को लेकर बहुत तनाव में रहते थे। हृषिकेश मुखर्जी से वे अपने संवाद मांगते थे जिससे वे पहले से अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा सकें । लेकिन हृषिकेश मुखर्जी उनसे यह कहते थे कि वे बस सेट पर आ जाएं,बाकी वे देख लेंगे। लेकिन उनके बहुत बार समझाने के बावजूद अमिताभ बच्चन की बेचैनी बनी रहती थी । इस पर हृषिकेश मुखर्जी ने जो धारणा व्यक्त की है वह अभिनय और रंगमंच के छात्रों के लिए एक नवीन अध्याय खोल देता है। उन्होंने कहा था कि यदि अभिनेता बहुत तैयारी के साथ आता है तब निर्देशक की मुश्किलें बहुत बढ़ जाती हैं क्योंकि गलतियां होने पर उन्हें ठीक करने में अधिक समय और ऊर्जा लगते हैं। फिर भी उन्होंने बच्चन जी को संवाद नहीं बताए मगर वह सीन अच्छे से समझा दिया । इधर अमिताभ उस सीन की तैयारी अपने तरह से करने लगे । इस तैयारी में वे इस कल्पना के आधार पर अभिनय कर रहे थे जैसे कि वास्तव में उनके परिजनों की मृत्यु हो गई हो।

इसी कॉन्सेप्ट पर उन्होंने जब रिहर्सल किया तो वह मुखर्जी साहब को बहुत भाया नहीं। तब उन्होंने बच्चन जी को बहुत प्रेम से समझाया कि यह सीन उन्हें निर्देशक की मांग और कल्पना के अनुसार करना पड़ेगा । अमित जी ने इसका महत्व समझा और फिर अपने अभिनय का तरीका बदला जिसमें उन्हें रोने या चुप रहने के बजाय राजेश खन्ना की मृत्यु हो जाने के बाद बहुत गुस्सा करने को कहा गया । यहां से चरित्र के रिएक्शन का एक नया भाव उन्हें समझ में आया और उन्होंने उस सीन को वैसे ही किया ।
इसके बाद आनंद में अमिताभ बच्चन का वह सीन और उसके संवाद बेहद यादगार हैं । उनके लिए हृर्षिकेश मुखर्जी ने भी यह कहा है कि अभिमानी और सजग होने के बावजूद अमिताभ बच्चन में यह एक गुण है कि वे अपने निर्देशक पर पूरा भरोसा करते हैं।
आज फिल्मों के अध्येता और अभिनय के समीक्षक यह मानते हैं कि उस दौर में गुस्से ने अमिताभ बच्चन को बनाया है । यहां तक कि उन्हें एंग्री यंग मैन कहा जाता रहा । लेकिन यह याद करना चाहिए कि अमिताभ बच्चन के इस गुस्से को निखारने की नींव रखने में हृषिकेश मुखर्जी जैसे भविष्य दृष्टा निर्देशक की बहुत बड़ी भूमिका है। स्वयं अमिताभ बच्चन इसे विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हैं लेकिन अभिनय करने वाले कलाकारों और रंगमंच के छात्रों और दर्शकों के लिए भी यह जानने और सीखने के लिए खोया और भूला हुआ अनिवार्य प्रसंग है।
लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक हैं।
प्रस्तुत लेख में प्रयोग में लिए गये फोटो गूगल जेमिनी के सौजन्य से हैं
कहानीतक.काम उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं
