अभिनेता देव आनंद की जीवनी ! Versatile Actor Dev Anand Biography in Hindi

अभिनेता देव आनंद की जीवनी ! Versatile Actor Dev Anand Biography in Hindi
  • नाम : देव आनंद
  • जन्म : 26/09/1923
  • मृत्यु: 3 december 2011

धरमदेव पिशोरीमल आनंद जिन्हें देव आनंद के नाम से जाना जाता है, एक प्रसिद्ध हिंदी फिल्म अभिनेता, लेखक, निर्देशक और निर्माता थे जिन्हें हिंदी सिनेमा में उनके काम के लिए जाना जाता है। उन्हें बॉलीवुड फिल्म उद्योग में सबसे महान और सबसे सफल अभिनेताओं में से एक माना जाता है।

प्रारम्भिक जीवन:

हिंदी सिनेमा में तकरीबन छह दशक तक दर्शकों पर अपने हुनर, अदाकारी और रूमानियत का जादू बिखेरने वाले सदाबहार अभिनेता देव आनंद का जन्म 26 सितंबर 1923 को पंजाब के गुरदासपुर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था. देव आनंद का असली नाम धर्मदेव पिशोरीमल आनंद था. उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में अपनी स्नातक की शिक्षा 1942 में लाहौर में पूरी की. 1943 में अपने सपनों को साकार करने के लिए जब वह मुंबई पहुंचे. तब उनके पास मात्र 30 रुपए थे और रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं था.

        देव आनंद ने मुंबई पहुंचकर रेलवे स्टेशन के समीप ही एक सस्ते से होटल में कमरा किराए पर लिया. उस कमरे में उनके साथ तीन अन्य लोग भी रहते थे जो उनकी तरह ही फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. देव आनंद को पहला ब्रेक 1946 में प्रभात स्टूडियो की फिल्म ‘हम एक हैं’ से मिला. हालांकि फिल्म फ्लॉप होने से दर्शकों के बीच वह अपनी पहचान नहीं बना सके. इस फिल्म के निर्माण के दौरान ही प्रभात स्टूडियो में उनकी मुलाकात गुरुदत्त से हुई जो उस समय फिल्मों में कोरियोग्राफर के रूप में अपनी पहचान बनाना चाह रहे थे.

        देवानंद   को पहली नौकरी Military Censor office में एक लिपिक के तौर पर मिली , जहा उन्हें सैनिको द्वारा लिखी चिट्ठियों को उनके परिवार के लोगो को पढकर सुनाना पड़ता था |  लगभग एक वर्ष तक Military Censor में नौकरी करने के बाद और परिवार की कमजोर आर्थिक स्तिथि को देखते हुए वह 30 रूपये जेब में लेकर पिता के मुम्बई जाकर काम न करने की सलाह के विपरीत वह अपने भाई चेतन आनन्द के साथ 1943 में मुम्बई पहुच गये | चेतन आनन्द के साथ देव भी भारतीय जन नाट्य संघ इप्टा से जुड़ गये | देवानंद  और उनके छोटे भाई विजय को फिल्मो में लाने का श्रेय उनके बड़े भाई चेतन आनन्द को जाता है और गायक बनने का सपना लेकर मुम्बई पहुचे देव आनन्द अभिनेता बन गये |

        अभिनेता के रूप में पहला ब्रेक 1946 में फिल्म “हम एक है ” से मिला जो फ्लॉप रही |फिर वर्ष 1948 में जिद्दी उनकी पहली हिट साबित हुयी | सन 1949 में उन्होंने “नवकेतन बैनर ” स्थापित किया और वर्ष 1950 में “अफसर ” का निर्माण किया जिसका निर्देशन उनके बड़े भाई चेतन आनन्द ने किया | सन 1951 में उनके बैनर की अगली फिल्म “बाजी ” का निर्देशन उनके दोस्त गुरुदत्त ने किया जिसने उनकी किस्मत बदल दी |

फिल्मी सफर :

        देव आनंद काम की तलाश में मुंबई आये और उन्होंने मिलट्री सेंसर ऑफिस में १६० रुपये प्रति माह के वेतन पर काम की शुरुआत की! शीघ्र ही उन्हें प्रभात टाकीज़ एक फिल्म हम एक हैं में काम करने का मौका मिला! और पूना में शूटिंग के वक़्त उनकी दोस्ती अपने ज़माने के सुपर स्टार गुरु दत्त से हो गयी! कुछ समय बाद अशोक कुमार के द्वारा उन्हें एक फिल्म में बड़ा ब्रेक मिला! उन्हें बॉम्बे टाकीज़ प्रोडक्शन की फिल्म ज़िद्दी में मुख्य भूमिका प्राप्त हुई और इस फिल्म में उनकी सहकारा थीं कामिनी कौशल, ये फिल्म १९४८ में रिलीज़ हुई और सफल भी हुई! १९४९ में देव आनंद ने अपनी एक फिल्म कम्पनी बनाई, जिसका नाम नवकेतन रखा गया, इस तरह अब वो फिल्म निर्माता बन गए! देव आनंद साहब ने अपने मित्र गुरुदत्त का डाइरेक्टर के रूप में चयन किया और एक फिल्म का निर्माण किया, जिसका नाम था बाज़ी, ये फिल्म १९५१ में प्रदर्शित हुई और काफी सफ़ल हुई।

        इसके बाद देव साहब नें कुछ भूमिकाएं निभाई जो कुछ नकरात्मक शेड लिए थीं! जब राज कपूर की आवारा पर्दर्शित हुई, तभी देव आनंद की राही और आंधियां भी प्रदर्शित हुईं! इसके बाद आई टेक्सी ड्राईवर, जो हिट साबित हुई! इस फिल्म में इनके साथ थीं कल्पना कार्तिक, जिन्होंने देव साहब के साथ विवाह किया और १९५६ में इन्हें एक पुत्र हुआ, जिसका नाम सुनील आनंद रखा गया।

देव आनंद-सुरैया प्रेम कहानी :

        1948 के साल में, जब देव आनंद 25 वर्ष के थे, उनकी दो और फिल्में प्रदर्शित हुईं – फणी मजूमदार की ‘हम भी इंसान हैं’ और गिरीश त्रिवेदी की ‘विद्या’। पहली फिल्म की नायिका रमोला थीं, जो 1951 में निर्देशक विजय म्हात्रे की फिल्म ‘स्टेज’ में उनकी नायिका बनीं। इनमें विद्या फिल्म इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस फिल्म में सुरैया पहली बार देव आनंद की नायिका बनीं और इसी के सेट पर दोनों के बीच प्यार हुआ था।   

        दोनों ने 1951 तक कुल सात फिल्मों में काम किया और इस दौरान देव आनंद-सुरैया के प्यार की कहानियाँ नर्गिस-राजकपूर और दिलीप कुमार-मधुबाला के प्यार की तरह देशभर में फैल गईं, जो आज तक फिल्मी पत्र-पत्रिकाओं और स्तंभों में बार-बार दोहराई जाती हैं। सुरैया तब एक स्थापित अभिनेत्री थीं।  

        सुरैया के साथ देव आनंद की दूसरी फिल्म ‘जीत’ 1949 में पर्दे पर आई। इसका निर्देशन बाद के जमाने की चर्चित अभिनेत्री विद्या सिन्हा के पिता मोहन सिन्हा ने किया था। इसी साल शायर,   नमूना और उद्धार फिल्मों का प्रदर्शन भी हुआ। ‘शायर’ में देव के साथ सुरैया और कामिनी कौशल, नमूना में कामिनी कौशल और उद्धार में मुनव्वर सुल्ताना तथा निरूपाराय थी। सुरैया और देव आनंद कुछ अड़चनों की वजह से से शादी नहीं कर पाएं, लेकिन उनकी मोहबब्बत के चर्चे आज भी होते हैं।   

देव आनंद और राजनीति :

        सिनेमा जगत में सदाबहार माने जाने वाले देवानंद साहब ने कभी राजनीति में भी कदम रखा था। मौका था देश में Emergency (आपातकाल) का। जून, 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब देश में आपातकाल लगाने का एलान किया तो देवानंद ने फिल्म जगत के अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर उसका पुरजोर विरोध किया था। बाद में जब आपातकाल खत्म हुआ और देश में चुनावों की घोषणा हुई, तो उन्होंने अपने प्रशंसकों के साथ जनता पार्टी के चुनाव प्रचार में भी हिस्सा लिया।

        बाद में उन्होंने “National Party of India” के नाम से एक राजनीतिक दल की भी स्थापना की, लेकिन कुछ समय बाद उसे भंग कर दिया। एक जमाना वह था, जब देवानंद की तूती बोलती थी। इसलिए उनकी लोकप्रियता की ऊंचाई की कल्पना आज के अभिनेता नहीं कर सकते। अपने आकर्षण से किंवदंती बन चुके देवानंद ने दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया है।

देव आनंद की मृत्यु :

देव आनंद की 88 वर्ष की आयु में 3 दिसंबर 2011 को लंदन के द वाशिंगटन मेफेयर होटल में उनके कमरे में हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु उनकी अंतिम फिल्म चार्जशीट की रिलीज़ के कुछ महीने बाद हुई। आनंद की मृत्यु के समय कथित तौर पर मेडिकल चेकअप के लिए लंदन में थे। 10 दिसंबर को, उनका अंतिम संस्कार सेवा लंदन के एक छोटे चैपल में आयोजित की गई थी, जिसके बाद उनके ताबूत को दक्षिण-पश्चिम लंदन के पुटनी घाटी श्मशान में ले जाया गया था। उनकी राख को गोदावरी नदी में विसर्जन के लिए भारत लाया गया था।