श्रीप्रकाश शुक्ला : आतंक का दूसरा नाम

श्रीप्रकाश शुक्ला : आतंक का दूसरा नाम

श्री प्रकाश शुक्‍ला यूपी में 90 के दशक का डॉन था. अखबारों के पन्ने हर रोज उसी की सुर्खियों से रंगे होते. यूपी पुलिस हैरान-परेशान थी. नाम पता था लेकिन उसकी कोई तस्‍वीर पुलिस के पास नहीं थी. बिजनेसमैन से उगाही, किडनैपिंग, कत्ल, डकैती, पूरब से लेकर पश्चिम तक रेलवे के ठेके पर एकछत्र राज. बस यही उसका पेशा था. और इसके बीच जो भी आया उसने उसे मारने में जरा भी देरी नहीं की. लिहाजा लोग तो लोग पुलिस तक उससे डरती थी. आखिरकार, यूपी पुलिस के एसटीएफ ने एक मुठभेड़ में उस 23 सितम्बर 1998 को मार गिराया !

कहानी शुरू से :

लड़के का नाम था श्रीप्रकाश शुक्ला. गोरखपुर के मामखोर गांव में उसके बाप मास्टरी करते थे. खुराक अच्छी थी तो श्रीप्रकाश पहलवानी में निकल गया. लोकल अखाड़ों में उसने अच्छा नाम कमाया. लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में पहली बार नाम आया 20 साल की उमर में. साल था 1993. राकेश तिवारी नाम के लफंगे ने उसकी बहन को देखकर सीटी बजा दी. श्रीप्रकाश ने उसे तत्काल माड्डाला और पुलिस से बचने के लिए बैंकॉक भाग गया.

लौटा तो उसके मुंह में खून लग चुका था और उसे ज्यादा की दरकार थी. बिहार में मोकामा के सूरजभान में उसे गॉडफादर मिल गया. धीरे-धीरे उसने अपना एंपायर बिल्ड किया और यूपी, बिहार, दिल्ली, पश्चिम बंगाल और नेपाल में सारे गैरकानूनी धंधे करने लगा. उसने फिरौती के लिए किडनैपिंग, ड्रग्स और लॉटरी की तिकड़म से लेकर सुपारी किलिंग तक में हाथ डाल दिया. एक अंदाजे के मुताबिक, अपने हाथों से उसने करीब 20 लोगों की जानें लीं.

रंगबाजी भी, बदमाशी भी, अय्याशी भी

बदमाशी के साथ वह आला दर्जे का अय्याश भी था और आखिर में इसी आदत ने उसका काम लगाया. उसकी पसंद थीं, महंगी कॉलगर्ल्स, बड़े होटल, मसाज पार्लर, सोने की जंजीरें और तेज भागने वाली कारें. फिल्मी आदमी था. दोस्तों के सामने डायलॉग मारता रहता था. उस दौर में वह सेलफोन का बड़ा दीवाना था. डींगे हांकता था कि उसका टेलीफोन का खर्च रोजाना 5 हजार रुपये है. जाहिर है, जिस आर्थिक बैकग्राउंड से वह आता था, पैसे का आकर्षण उसके लिए सहज था.

रंगबाजी और बदमाशी कभी एक-दूसरे के आड़े नहीं आई. श्रीप्रकाश एक शान-ओ-शौकत वाली जिंदगी जी रहा था. लेकिन उसे और ज्यादा चाहिए था. उसे एहसास था कि यूपी में बड़े-बड़े माफिया हैं जो उसे नौसिखिये से ज्यादा नहीं समझेंगे. उन्हें ठोंक-पीट के ही अपने नीचे लाना होगा. उसने तय कर लिया कि वह एक-एक करके हर मठाधीश का काम लगाएगा.

शाही को बीच लखनऊ भून दिया

यूपी में क्राइम की दुनिया की धुरी था, महाराजगंज के लक्ष्मीपुर का विधायक वीरेंद्र शाही. 1997 की शुरुआत में श्रीप्रकाश ने लखनऊ शहर में वीरेंद्र शाही को गोलियों से भून दिया. हल्ला हो गया भाई. नए लड़के ने शाही को पेल दिया. पुराने माफियाओं की भी चोक ले गई. श्रीप्रकाश ने अपनी हिट लिस्ट में दूसरा नाम रखा कल्याण सरकार में कैबिनेट मंत्री हरिशंकर तिवारी का. जो चिल्लूपार विधानसभा सीट से 15 सालों से विधायक थे. जेल से चुनाव जीत चुके थे. श्रीप्रकाश ने अचानक तय किया कि चिल्लूपार की सीट उसे चाहिए. उसने बहुत कम समय में बहुत दुश्मन बना लिए.

यूपी कैबिनेट में हरिशंकर तिवारी को छोड़कर वह पूरी ब्राह्मण लॉबी के करीब था. कल्याण सिंह को वह निजी दुश्मन मानता था.

STF की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभा द्विवेदी, अमरमणि त्रिपाठी, रमापति शास्त्री, मार्कंडेय चंद, जयनारायण तिवारी, सुंदर सिंह बघेल, शिवप्रताप शुक्ला, जितेंद्र कुमार जायसवाल, आरके चौधरी, मदन सिंह, अखिलेश सिंह और अष्टभुजा शुक्ला जैसे नेताओं से उसके रिश्ते थे.

बिहार के बाहुबली मंत्री का मर्डर

बिहार सरकार में बाहुबली मंत्री थे बृज बिहारी प्रसाद. UP के आखिरी छोर तक उनका सिक्का चलता था. श्रीप्रकाश शुक्ला ने पटना में उन्हें गोलियों से भून डाला. 13 जून 1998 को वह इंदिरा गांधी हॉस्पिटल के सामने वह अपनी अपनी लाल बत्ती कार से उतरे ही थे कि एके-47 से लैस 4 बदमाश उन्हें गोलियों से गुड आफ्टरनून कह के फरार हो गए.

इस कत्ल के साथ श्रीप्रकाश का मैसेज साफ था, कि रेलवे के ठेके को उसके अलावा कोई छू नहीं सकता. कई छुटभइयों बदमाशों को तो उसने दौड़ा दौड़ा कर मारा था.

बृजबिहारी के कत्ल का मामला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि यूपी पुलिस को ऐसी खबर मिली कि उनके हाथ पांव फूल गए. श्रीप्रकाश शुक्ला ने यूपी के CM कल्याण सिंह की सुपारी ले ली थी. 6 करोड़ रुपये में सीएम की सुपारी लेने की खबर UP पुलिस की STF के लिए बम गिरने जैसी थी.

90 के दशक में श्रीप्रकाश शुक्ला ने अपनी करतूतों से यूपी पुलिस और खासतौर पर लखनऊ पुलिस की नाक में दम कर रखा था। वो वारदात करके निकल जाता और पुलिस लकीर पीटती रह जाती । इसके अलावा पुलिस का एक सिरदर्द और बढ़ गया था वो था मोबाइल फोन का इस्तेमाल । 31 मार्च 1997 को पहली बार लखनऊ में मोबाइल फोन की शुरुआत हुई थी । लखनऊ के केसर बाग में हुए दिलीप होटल गोलीकांड में रेलवे ठेकेदार भानू मिश्रा के कमरे में ए के 47 का बर्सट फायर मारने के बाद श्रीप्रकाश ने गोरखपुर में उसके घर लैंडलाइन पर फोन कर भानू के बड़े भाई को बताया था कि तुम्हारे छोटे भाई का मर्डर हो गया है कफन के साथ लखनऊ पहुंचो ।

चूंकि फोन वारदात के महज दो मिनट बाद किया गया था लिहाजा पुलिस ने अपराधियों को पकड़ने के लिए पांच-सात किलोमीटर के दायरे में जितने भी एसटीडी बूथ थे वहां पर छापेमारी की लेकिन पुलिस को कोई कामयाबी हाथ नहीं लगी। कई दिन बाद लखनऊ पुलिस को पता चला कि फोन मोबाइल फोन से किया गया था । मोबाइल का कनेक्शन गोमतीनगर के एक पते पर लिया गया था।

पुलिस को पता चला कि पिछले तीन दिन से वो मोबाइल फोन गोमती नगर के उसी टॉवर में चल रहा था जिस पते पर मोबाइल खरीदा गया था। लखनऊ पुलिस को उम्मीद थी कि हो सकता है कि चौथे दिन भी फोन करने वाला वहीं मौजूद हो। तुरंत एक क्रैक टीम तैयार की गई और रात में उस मकान पर दबिश दी गई। जब दबिश दी गई तो वहां पर पुलिस को एक महिला और दो लड़कियां मिली । पुलिस ने पूरे मकान की तलाशी ली लेकिन वहां से पुलिस को कुछ खास नहीं मिला । पहली बार ये जरुर पता चला कि हत्या और वसूली की वारदात को अंजाम देने वाला न तो अशोक सिंह है और न ही सूरजभान बलकि श्रीप्रकाश शुक्ला है । श्री प्रकाश, अशोक सिंह और सूरजभान के नाम से वसूली के लिए फोन किया करता था ताकि पुलिस नामों में ही उलझी रहे।

एक तरफ तो श्री प्रकाश शुक्ला गैंग के मोबाइल फोन का इस्तेमाल पुलिस के लिए सिरदर्द बना हुआ था । वहीं दूसरी तरफ पुलिस जिस बड़े अपराधी को पकड़ने की तमाम कोशिशें कर रही थी उसकी फोटो तक पुलिस के पास नहीं थी। तमाम कोशिशों के बावजूद पुलिस को श्रीप्रकाश शुक्ला की कोई फोटो नहीं मिल रही थी। गोरखपुर में श्री प्रकाश शुक्ला के ताप का शिकार बने वीरेन्द्र शाही और हरिशंकर तिवारी से भी संपर्क किया गया । दोनों का ही पूर्वांचल में खासा दबदबा था ।

उनसे भी श्री प्रकाश की फोटो उपलब्ध कराने के लिए कहा गया । दोनों ही परिवारों ने काफी कोशिश की लेकिन श्री प्रकाश शुक्ला की फोटो उन्हें भी नहीं मिली। श्री प्रकाश के दो दोस्त नीलेन्द्र पांडे और किशोरी लाल से भी पुलिस ने संपर्क किया कि कहीं से श्री प्रकाश की फोटो मिल जाए लेकिन उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए। पुलिस को पता चला कि गोरखपुर में सैनी नाम का एक फोटोग्राफर था जो शादियों में फोटो खींचा करता था, वीडियो भी बनाया करता था । पुलिस को लगा कि इस फोटोग्राफर से श्री प्रकाश शुक्ला की कोई फोटो मिल जाए।

पुलिस को अंधेरे में उम्मीद की किरण नजर आ रही थी। इस बात की खबर लगाई गई कि श्री प्रकाश गोरखपुर में किस-किस शादी में शरीक हुआ था । पता चला कि दो-तीन शादी में वो गया था । फोटोग्राफरों का भी पता किया गया उन्हें भी उठाया गया लेकिन सबने मना कर दिया। इस बीच इस बात की खबर श्री प्रकाश को भी लगी । एक दिन श्री प्रकाश सैनी फोटोग्राफर के पास गया और उसको बोला कि तुम मेरी फोटो बांट रहे हो उसने मना किया इस पर श्री प्रकाश ने तीन-चार गोली उसके जिस्म में उतार दीं और वहां से चलता बना । सैनी फोटोग्राफर के कत्ल के बाद तो सारे फोटोग्राफर्स के बीच दहशत फैल गई और अब कोई भी पुलिस की मदद करने के लिए तैयार नहीं था।

पुलिस के सामने सारे रास्ते बंद होते जा रहे थे क्योंकि केवल चेहरे-मोहरे, कद-काठी का अंदाजा लगाकर वो कैसे श्री प्रकाश का कोई स्कैच बनवाते । हालांकि लखनऊ पुलिस ने हिम्मत नहीं हारी और श्री प्रकाश की फोटो ढूंढने के काम में लगी रही। पुलिस को पता लगा कि लखनऊ के हजरतगंज में श्री प्रकाश शुक्ला का एक रिश्तेदार रहता है । श्री प्रकाश का उसके घर पर आना जाना था । पुलिस को लगता था कि वहां पर कोई फोटो मिल जाए।

फोटो न मिलने की वजह से पुलिस की बहुत फजीहत हो रही थी लिहाजा पुलिस ने तय किया कि सबसे पहले श्री प्रकाश की फोटो ढूंढी जाए क्योंकि श्री प्रकाश के मूवमेंट के बारे में पुलिस को खबर मिलती रहती थी और पुलिस उन जगहों पर निगरानी और छापेमारी भी करती थी लेकिन बिना फोटो के ये काम बेहद मुश्किल हो रहा था।

तय किया गया कि रिश्ते में श्री प्रकाश के बहनोई लगने वाले शख्स के यहां रेड डाली जाए। पुलिस की एक टीम उस मकान पर पहुंची और लॉटरी का व्यवसाय करने वाले उस रिश्तेदार को धर-दबोचा । पहले तो उसने श्री प्रकाश से कोई भी रिश्ता होने से मना कर दिया लेकिन जब पुलिस ने सख्ती की तो उसने बताया कि श्री प्रकाश अक्सर उसके यहां आता था लेकिन पिछले कई दिन से वो नहीं आ रहा है।

पुलिस ने उससे श्री प्रकाश की फोटो मांगी और साथ ही उसे धमकी भी दी कि वो कहीं से भी श्री प्रकाश की फोटो पुलिस को उपलब्ध कराएं नहीं तो पुलिस उसके खिलाफ ही अपराधी को शरण देने और बाकी मुकदमों में उसके खिलाफ और घर की महिलाओं के खिलाफ कार्रवाई कर उनको भी जेल भेजा जाएगा। हालांकि इस धमकी का पति-पत्नी पर कोई असर नहीं पड़ा और वो लगातार इस बात की रट लगा रहे थे कि वो श्री प्रकाश शुक्ला की फोटो उपलब्ध नहीं करा सकते हैं ।

इस बीच घर की बेटी आ गई और पुलिस ने उससे अलग कमरे में ले जाकर पूछताछ करना शुरु किया। उसने बताया कि श्री प्रकाश उसका मामा लगता है। पुलिस ने अब उस लड़की को विश्वास में लेना शुरु किया और उससे पूछा गया कि उसको किस चीज का शौक है तो उसने बताया कि उसे फोटोग्राफी का शौक है। पुलिस ने पूछा फोटोग्राफी किससे करती हो कैमरा है तुम्हारे पास तो वो एक छोटा कैमरा निकाल कर ले आई और पुलिस को अपना कैमरा दिखाया।

पुलिस ने छापेमारी करने से पहले होमवर्क भी किया था । लिहाजा पुलिस को इस बात का पता था कि आखिरी बार श्री प्रकाश अपने बहनोई के यहां अपनी भांजी के जन्मदिन पर आया था। ये भी पता चला कि वो महंगा तोहफा लेकर घर पर पहुंचा था। लड़की ने बताया कि छह महीने पहले उसका जन्मदिन था। पुलिस ने पूछा क्या उस दिन की तस्वीरें है तुम्हारे पास तो लड़की ने बताया कि हां उस वक्त की तस्वीरें उसके पास हैं। वो एक किताब लेकर वापस आई और उसी किताब के पन्नों के बीच से उसने चार-पांच फोटोग्राफ निकालकर पुलिस को थमा दीं।

तस्वीरों में उसके मां-बाप, उसके कुछ दोस्त भी दिख रहे थे। साथ ही फोटो में एक खूबसूरत नौजवान भी पुलिस को नजर आया । पुलिस ने लड़की से पूछा कि ये कौन है तो उसने बताया कि यही श्री प्रकाश मामा हैं। फोटो मिलने की खबर पास के ही कमरे में बैठे लड़की के मां-बाप को भी लग गई। दोनों भाग के अब उस कमरे में आ गए जहां पर पुलिस लड़की से पूछताछ कर रही थी। आते ही दोनों ने पुलिसवालों के पांव पकड़ लिए। उनका कहना था कि ये फोटो अगर बाहर किसी ने देखी या कहीं भी छपी तो श्रीप्रकाश को पता लग जाएगा कि ये फोटो इसी घर में खिंची है और वो किसी भी हालत में पूरे परिवार को छोड़ेगा नहीं । वो सौ फीसदी पूरे परिवार का कत्ल कर देगा भले ही वो उसके रिश्ते में बहन-बहनोई लगते हों।

पुलिस ने परिवार को दिलासा दिलाया कि अगर श्री प्रकाश ने फोटो देख भी ली तब भी उसे पता नहीं चलेगा । इसके बाद पुलिस की टीम वहां से निकल गई । टीम को फोटो के साथ एसएसपी दफ्तर आने को कहा गया क्योंकि तत्कालीन एसएसपी श्री प्रकाश की फोटो को प्रेस कॉन्फ्रेंस में जारी करना चाहते थे । हालांकि पति-पत्नी की बात अब भी पुलिस के दिमाग में घूम रही थी क्योंकि उन्हें लग रहा था कि फोटो सार्वजनिक होते ही इस परिवार का बचना मुश्किल है । अगर परिवार को कुछ होता है तो फिर से पुलिस की फजीहत होगी क्योंकि श्री प्रकाश के रिश्ते का बहनोई लॉटरी का एक बड़ा व्यापारी था और उसका समाज में ठीकठाक रसुख था।

पुलिस की टीम बस इस उधेड़बुन में लगी थी कि कैसे कुछ ऐसा किया जाए कि काम भी हो जाए और श्री प्रकाश को पता भी न लगे कि पुलिस को ये फोटो कहां से मिली है। तब पुलिस की टीम के एक सदस्य ने सुझाव दिया कि इस फोटो का नक्शा चेंज कर दिया जाए यानि कुछ ऐसा किया जाए कि मालूम ही न चले कि ये फोटो कब और कहां ली गई थी। पुलिस के एक अधिकारी उस फोटोग्राफ को लेकर हजरतगंज बाजार गए और वहां उन्होंने पटरी पर हीरो की इमेज वाले कई पोस्टकार्ड बिक रहे थे। उनके दिमाग में आइडिया आया ।

उन्होंने एक पोस्टकार्ड लिया जिस पर सुनील शेट्टी की तस्वीर थी जिसमें उसने डेनिम शर्ट पहन रखी थी। इसके बाद वो उस पोस्टकार्ड को लेकर एक रंगीन फोटो स्टेट की दुकान पर पहुंचे । श्री प्रकाश शुक्ला की फोटोग्राफ देखकर दुकानदार भी घबरा गया लेकिन जब पुलिस ने उसे विश्वास में लिया तो वो तैयार हो गया। बड़ी बारीकी से फोटोग्राफ में से श्रीप्रकाश शुक्ला के चेहरे और गर्दन का हिस्सा काटा गया उसके बाद पोस्टकार्ड में से सुनील शेट्टी की गर्दन और चेहरे का हिस्सा काटा गया और फिर पोस्टकार्ड में सुनील शेट्टी की फोटो में श्री प्रकाश शुक्ला का सिर फिट कर दिया गया।

खुशकिस्मती से श्री प्रकाश के चेहरे वाला फोटो पोस्टकार्ड वाले सुनील शेट्टी के चेहरे पर पूरी तरह से फिट आ गया और देखकर अंतर बताना मुश्किल था कि इस फोटो में चेहरा और धड़ अलग हैं। इसके बाद ग्लॉसी शीट पर उस फोटोग्राफ की करीब दो सौ कॉपियां निकाली गईं और इन सभी फोटो कॉपियों को लेकर वो अधिकार एसएसपी दफ्तर रवाना हो गए।

कुछ दिन बाद पुलिस ने एक फोन टैप किया जिसमें श्री प्रकाश का गुर्गा उसे बताता है कि उसकी फोटो सारे अखबारों में छपी है । इस पर श्रीप्रकाश ने पूछा कि उसने क्या पहन रखा है। गुर्गे ने बताया कि उसने डेनिम की शर्ट पहन रखी है इस पर श्री प्रकाश ने जवाब दिया कि वो डेनिम की शर्ट इस वजह से नहीं पहनता क्योंकि डेनिम की शर्ट दिल्ली-मुंबई जैसे बड़े शहरों में पहनी जाती है और छोटे शहरों में इस तरह की शर्ट पहनने वाले लोगों को आसानी से पहचाना जा सकता है।

पुलिस ने जब फोन ट्रेस किया तो पता चला कि श्री प्रकाश उस वक्त नेपाल में मौजूद था। हालांकि अपनी फोटो मिलने से वो बेहद परेशान हो गया था। बस यहीं से श्री प्रकाश की आखिरी गिनती भी शुरु हो गई । हालांकि इसके बाद भी श्री प्रकाश ने कई वारदात को अंजाम दिया लेकिन आखिरकार वो केवल और केवल उसी फोटो की वजह से मारा गया।

हाथ धोकर पीछे पड़ी STF

STF का अब एक्कै मकसद था- श्रीप्रकाश शुक्ला, जिंदा या मुर्दा. सारे घोड़े दौड़ा दिए गए. अगस्त 1998 के आखिरी हफ्ते में पुलिस को अहम सुराग मिला. पता चला कि दिल्ली के वसंत कुंज में श्रीप्रकाश ने एक फ्लैट लिया है. उसका धंधा अंधेरे में ही परवान चढ़ता. शाम का झुटपुटा होते ही वह अपने मोबाइल फोन से कॉल करने लगता.

श्रीप्रकाश ने लखनऊ में 105 फ्लैट बनाने वाले एक बिल्डर को अपनी जिंदगी की आखिरी धमकी दी थी. उसकी मांग सीधी थी, ‘हर फ्लैट पर 50 हजार रुपये की रंगदारी.’

मगर उससे एक बड़ी गलती हो गई. उसके पास 14 सिम कार्ड थे. लेकिन पता नहीं क्यों, जिंदगी के आखिरी हफ्ते में उसने एक ही कार्ड से बात की. इससे पुलिस को उसकी बातचीत सुनना और उस इलाके को खोजना आसान हो गया. 21 सितंबर की शाम एक मुखबिर ने STF को बताया कि अगली सुबह 5:45 बजे शुक्ला रांची के लिए इंडियन एअरलाइंस की फ्लाइट लेगा. दिल्ली एयरपोर्ट पर घात लगाने का प्लान बना. तड़के 3 बजे पुलिस तैनात हो गई, पर वह नहीं आया.

मोहन नगर के पास हुई मुठभेड़

लेकिन दोपहर बाद पुलिस की किस्मत ने पलटा खाया. शुक्ला अब भी अपना मोबाइल फोन इस्तेमाल कर रहा था.

पुलिस को पता चला कि वह वसंत कुंज के अपने ठिकाने से निकलकर अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने गाजियाबाद जाएगा. पुलिस ने उसकी वापसी के समय जाल बिछा दिया. दिल्ली-गाजियाबाद स्टेट हाइवे पर फोर्स लग गई.

दोपहर 1.50 बजे उसकी नीली सिएलो कार मोहननगर फ्लाइओवर के पास दिखी तो वहां पुलिस की 5 गाड़ियां तैनात थीं. गाड़ी का नंबर HR26 G 7305 फर्जी था, वह किसी स्कूटर को आवंटित था.

इधर से 45 गोलियां चलीं उधर से 14

गाड़ी शुक्ला चला रहा था और अनुज प्रताप सिंह उसके साथ आगे और सुधीर त्रिपाठी पीछे बैठा था. उसे खतरा महसूस हुआ. उसने स्पीड बढ़ाई और पुलिस की पहली और दूसरी गाड़ी को चकमा दे दिया. तभी इंस्पेक्टर वीपीएस चौहान ने अपनी जिप्सी उसकी कार के आगे अड़ा दी. खतरे को सामने देख शुक्ला ने बाएं घूमकर गाड़ी तेजी से यूपी आवास विकास कालोनी की तरफ भगाई. पुलिस ने पीछा किया.

एनकाउंटर के बाद शुक्ला का लाश

स्टेट हाइवे से एक किलोमीटर हटकर उसे घेर लिया गया. उसने भी रिवॉल्वर निकाल ली. उसने 14 गोलियां दागीं तो पुलिस वालों ने 45. मिनटों में उसका और उसके साथियों का काम लग गया. तारीख थी 22 सितंबर 1998. सवा 2 बजे तक ऑपरेशन बजूका पूरा हो गया था.

शुक्ला का ऐसा अंत नहीं होता अगर वह बदमाशी और रंगबाजी के नशे में चूर न होता. वह राजनीति में उतरना चाहता था और मुमकिन है कि जल्दी ही कानून से पटरी बैठा लेता. उसकी मौत से कुछ महीनों पहले लोग मजाक में कहने लगे थे कि कहीं वह यूपी का मुख्यमंत्री न बन जाए. वैसे श्रीप्रकाश शुक्ला की जिंदगी पर पिक्चर भी बन चुकी है. 2005 में आई थी, अरशद वारसी की ‘सहर.’उसके ज़िन्दगी पर रंगबाज़ जैसी वेब सीरीज भी बन चुकी है !!