मौलानीया डकैती : जब चम्पारण आये भगत सिंह

मौलानीया डकैती : जब चम्पारण आये भगत सिंह

जरा याद करो कुर्बानी जंग ए आजादी में गति देने के लिए धन की थी जरूरत। पढि़ए उन देशवीरों की कहानी जिन्‍होंने आजादी के लिए अपनी जान लुटा दी।

धन की कमी के कारण चम्पारण आये भगत सिंह

जैसे ही जंगे आजादी का प्रसंग शुरू होता है अधिवक्ता नसीब साहेब भावुक हो जाते हैं। अपनी बात रखने से पहले कहते हैं कि मैँ जंगे आजादी के दिवानों को प्रणाम करता हूं, जिन्होंने अपनी जान देकर भारत को आजाद कराया। नसीम बताते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम में नरम दल का नेतृत्व  गांधी जी के हाथों में था। क्रांतिकारी अहिंसा से आजादी मिल जाएगी, इस विचारधारा से वे वास्ता नहीं रखते हैं। 1928 में बिहार बंगाल में क्रांतिकारियों का नेतृत्व कर रहे चन्द्रशेखर आजाद ने भगत सिंह को क्रांति का जायजा लेने चम्पारण भेजा।

 बेतिया के निकटवर्ती गांव भितहां निवासी केदार मणि शुक्ल को भगत सिंह का मार्गदर्शन का जिम्मा सौंपा गया। श्री शुक्ला ने भगत सिंह को बताया कि जंगे आजादी को आगे बढ़ाने के लिए धन की कमी सबसे बड़ी बाधा है। भगत सिंह ने इसके समाधान के लिए चनपटिया के गुलालजी के यहां बैठक करने का निर्णय लिया। तुनिया निवासी नन्हकु सिंह, भगवा के पंडित कमलनाथ तिवारी, हाजीपुर निवासी योगेन्द्र शुक्ल आदि क्रांतिकारी बैठक में शामिल हुए।

पता चला कि मौलनिया गांव के दर्शन महतो के घर काफी रुपये हैं और वहां कोई अस्त्र शस्त्र भी नहीं हैं। तब अस्त्र शस्त्र से लैस युवकों की टोली तैयार हो गई। 1925 के काकोरी षडयंत्र से बचकर बेतिया पहुंचे चन्द्रशेखर आजाद ने नगर के जोड़ा इनार स्थित हरिवंश सहाय के मकान में प्रवास के लिए आ गए और क्रांतिकारियों को पिस्टल चलाने की कला में पारंगत कर दिया। मलौनिया की डकैती में एक भी हत्या नहीं हो सके, इस पर जोर दिया जाय।

सब कुछ तय हो जाने के बाद क्रांतिकारियों ने मौलनिया के दर्शन महतो के आवास पर हमला बोल दिया, लेकिन वहां भी दुर्भाग्य से क्रांतिकारियों एवं ग्रामीणों के बीच भिड़ंत हो गई। इस क्रम में ग्रामीण भी मारे गए। लेकिन इस बार क्रांतिकारी धन प्राप्त करने में सफल हो गए। पुलिस अनुसंधान में जुट गई। जांच करने के क्रम में पता चला कि एक क्रांतिकारी के हाथ की केहुनी खुखरी से कट गई है। यह भी पता चला कि घायल के साथ ही तिजोरी की चाबी नहीं देने पर जमींदार पर खुखरी से वार करना चाहा। एक क्रांतिकारी उसे रोकने का प्रयास किया।

पुलिस की करवाई , फणीन्द्र घोष की गद्दारी और सजा

इसी क्रम में उनकी केहुनी कट गई है। पुलिस जाल बिछाया। पंडित कमलनाथ तिवारी अस्पताल में भर्ती थे। उनके हाथ के केहुनि पर पट्टी बंधी हुई थी। संदेह होने पर पुलिस ने उप पर पहरा बैठा दिया। समय ने पलटा लिया। फणिन्द्र नाथ घोष कोलकाता में पकड़ लिए गए। पुलिस जुर्म से घबड़ाकर घोष ने क्रांतिकारियों के सारे नेटवर्क का खुलासा कर दिया। मुमजात के नेतृत्व में पंजाब पुलिस के साथ सीआईडी की टीम बेतिया पहुंच गई। सभी लोग पकड़ लिए गए।

 मोतिहारी में उनपर मुकदमा चला। केदार मणि शुक्ल को बीस वर्ष एवं अन्य को दस वर्ष की सजा हुई। पंडित कमलनाथ तिवारी को लहौर षडयंत्र केस में सजा हुई। नन्हकू सिंह, कमलनाथ तिवारी, गुलाली जी, केदार मणि शुक्ल को अंडमान पोर्ट प्लैयर जेल भेज दिया गया। वहीं भगत सिंह को सुखदेव एवं राजगुरु के साथ सैंडर्स हत्या कांड में फांसी पर लटका दिया गया।

दूसरा पहलू :

स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में हथियार खरीदने के लिए पैसा एकत्रित करने के लिए भगत सिंह वर्ष 1929 में चंपारण में आए थे। पश्चिम चंपारण के क्रांतिकारी कमलनाथ तिवारी, केदार मणि शुक्ल जैसे दर्जनों क्रांतिकारियों ने अंग्रे•ाी हुकूमत का जीना दुश्वार कर रखा था। काकोरी लूटकांड के बाद देश में जगह-जगह छापे पड़ रहे थे। अंग्रेजी हुकूमत से बचते-बचाते 1925 में चंद्रशेखर आ•ाद बेतिया पहुंचे थे। क्रांतिकारी पीर मोहम्मद मुनीस राज हाईस्कूल के शिक्षक हरिवंश सहाय के मित्र थे। बाद में उन्हें क्रांतिकारियों को मदद करने के आरोप में हटा दिया गया था। इन सबों के सहयोग से आंदोलन की लौ जलाने की कोशिश हुई थी। स्वाधीनता सेनानी पंडित राजकुमार शुक्ला महाविद्यालय सतवरिया के प्राध्यापक शंभू आलोक बताते हैं कि भगत सिंह के मित्र केदार मणि शुक्ल उनको चंपारण लाए थे। वर्ष 1980 भगत सिंह के शहादत दिवस के अवसर पर महाविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में क्रांतिकारी केदार मणि शुक्ल ने भगत सिंह के चंपारण प्रवास से जुड़े संस्मरण साझा किया था। बताया था कि भगत सिंह उदयपुर जंगल में भेष बदलकर करीब 2 सप्ताह तक ठहरे थे। केदार मणि शुक्ल के घर से उनके लिए खाना बन कर जाता था। वे एक रात बेतिया के जोड़ा इनार मोहल्ले में शिक्षक हरिवेश सहाय के घर भी ठहरे थे। पहचान छुपाने के लिए भगत सिंह को बबुआजी कह कर पुकारा जाता था। इसी दौरान महाराजा पुस्तकालय के मैदान में क्रांतिकारी एकत्रित हुए थे। जहां असेंबली में बम फेंकने पर चर्चा हुई थी। लेकिन यहां अंतिम फैसला नहीं हो सका था।

मौलानिया डकैती कांड के बाद लौट गए थे भगत सिंह

चंपारण प्रवास के दौरान भगत सिंह चनपटिया में भी आए थे। इसमें पंडित केदार मणि शुक्ल की अहम भूमिका थी। वे वेश बदलकर चनपटिया के नागेश्वर नाथ दास मंदिर में ठहरे थे। फिर बेतिया लौट गए थे। स्वाधीनता संग्राम के लिए हथियार खरीदने को पैसे के लिए क्रांतिकारियों ने भगत सिंह के नेतृत्व में मौलानिया गांव में हरगुन महतो के घर डाका डालने की योजना बनाई गई। किस्मत ने यहां भी क्रांतिकारियों का साथ नहीं दिया। डकैती के क्रम में क्रांतिकारी पंडित कमलनाथ तिवारी की कुहनी कट गई। खून रुकने का नाम नहीं ले रहा था। पंडित कमलनाथ तिवारी को बेतिया अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन यहां अंग्रेज अधिकारी पहुंच गए।

साभार : जागरण