कश्मीर समस्या : एक ज्वलन्त मुद्दा

कश्मीर समस्या : एक ज्वलन्त मुद्दा

कश्मीर भारत की बहुत पुरानी समस्या है. आज़ादी के समय जब हिन्दुतान का बंटवारा दो देशों में हुआ, तो सवाल ये उठा कि कश्मीर किस देश के साथ जाएगा. मुस्लिम लीग के नेता जिन्ना के अनुसार इसे पकिस्तान में जाना चाहिए था, क्योंकि उस समय कश्मीर की आबादी का लगभग 77 प्रतिशत हिस्सा मुस्लिम था और जिन्ना के पाकिस्तान की मांग मुस्लिम धर्म का हवाला दे कर की थीकिन्तु यह तर्क कश्मीर के लिए ग़लत था. वहीँ दूसरी तरफ़ यहाँ के राजाराजा हरी सिंह ने कश्मीर को भारत अथवा पकिस्तान में सम्मिलित नहीं करना चाहते थे. हालाँकि कालांतर में राजनैतिक स्तिथियाँ ऐसी परिवर्तित हुईं, कि कश्मीर को भारत के साथ सम्म्लिलित होने में ही सुरक्षा महसूस हुई. इस बीच भारत और पाकिस्तान दोनों के बीच कई समझौते वगैरह शामिल थे. यहाँ पर उन्हीं समझौतों, इतिहासों आदि पर चर्चा की गई है.  

कश्मीर का इतिहास (Kashmir History in hindi)

तत्कालिक समय में प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, हमें जो जानकारियाँ प्राप्त होती है, उससे पता चलता है, कि यह क्षेत्र मौर्यों के शासन क्षेत्र के अन्तर्गत आता था. इसके बाद यहाँ पर कुषाण जाति के लोगों का शासन रहा. कुषाण जाति के लोग बौद्ध धर्म को मानते थे. इस वजह से इस स्थान पर बौद्ध धर्म का ख़ूब प्रसार हुआ और ये स्थान बौद्ध धर्म के अध्ययन का केंद्र बन गया. कुषाण वंश का महान राजा कनिष्क ने चौथा बुद्दिस्ट कौंसिल का भी आयोजन किया. इनके उपरान्त विभिन्न तरह के हिन्दू राजाओं का समय समय पर राज रहा. इन्हीं हिन्दू राजाओं में से एक वंश ने, जिनका नाम कर्तोका था, यहाँ पर स्थित सूर्य मंदिर मार्तंड की स्थापना की. इसके बाद 13 वीं सदी के आस पास इस्लाम कश्मीर में आया. इस्लाम कश्मीर में आने पर यहाँ के कई लोगों का धर्म इस्लाम में बदल दिया गया. अंतत यहाँ के राजा को भी इस्लाम में बदलना पड़ा. इसी समय कश्मीर सल्तनत की शुरुआत हुई.

कालांतर में सन 1586 के आस पास मुगलों ने कश्मीर को अपने कब्ज़े में कर लिया. यह समय अकबर के शासन का समय था. इसके बाद अफगानियों ने सन 1751 के आस पास कश्मीर में आक्रमण करना प्रराम्भ किया. इस समय अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली ने इस समय के कमज़ोर मुग़ल को हरा कर, यहाँ पर अपना राज्य स्थापित किया. इसके उपरान्त कुछ वर्षों के बाद साल 1819 में सिखों के तात्कालिक राजा महाराजा रणजीत सिंह ने अफगानियों को हरा कर कश्मीर को अपने राज्य में मिला लिया. साल 1846 में जब महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हो चुकी थी, इस समय अंग्रेजों ने सिख- एंग्लो युद्ध में सिक्खों को हरा कर यहाँ पर डोगरा वंश के लोगों को शासन करने के लिए छोड़ दिया. डोगरा वंश के राजा महाराजा गुलाब सिंह ने इस राज्य में राजा बनने के लिए 75 लाख रूपए दिए थे. इसके बाद इसी वंश ने यहाँ पर 100 वर्षों तक राज किया!

कश्मीर के राजा महाराजा हरि सिंह (Kashmir Raja Hari Singh)

महाराजा हरि सिंह साल 1947 के दौरान यह चाहते थे, कि बंटवारे के बाद कश्मीर न तो भारत में शामिल हो और न ही पाकिस्तान में. हरी सिंह कश्मीर को एशिया का स्वीटज़रलैंड बनाना चाहते थे. इसी समय यहाँ पर नेशनल कांफ्रेंस पार्टी के संस्थापक शेख अब्दुल्ला और उनके लोग कश्मीर में लोकतंत्र लाने के लिए काम कर रहे थे. ये चाहते थे कि कश्मीर में किसी राजा का राज न हो कर, लोकतंत्र की स्थापना हो या ऐसा हो कि राजा रहे किन्तु राजा के पास बहुत सीमित शक्तियां हों. इस पार्टी को उस समय की पार्टी इंडियन नेशनल कांग्रेस का भी पूरा सहयोग प्राप्त था. इस समय पूरे देश को एक नए तंत्र की ज़रुरत थी और इसी वजह से कांग्रेस देश में लोकतन्त्र लाने के लिए शेख अब्दुल्ला का साथ दे रही थी.

इसी समय जिन्ना ये चाहते थे, कि भारत दो भागों में हिन्दू और मुस्लमान के नाम पर विभाजित हो. उनका ये मानना था कि दो देश बने, जिसमे एक हिन्दू बहुल और एक मुसलमान बहुल देश हो. इस तरह से जिन्ना का कहना था, कि उस समय के 77% वाले मुस्लिम आबादी वाला कश्मीर पाकिस्तान में शामिल हो जाए, लेकिन महाराजा हरि सिंह ने ऐसा नहीं होने दिया और उन्होंने एक समझौते पर हस्ताक्षर किया, कि पाकिस्तान से दोनों देशों के व्यापार आदि ज़ारी रहेंगे, किन्तु कश्मीर किसी भी देश में शामिल नहीं होगा.

कश्मीर में होने वाले विभिन्न विद्रोह और समस्याएं (Kashmir Revolts and Issue )

  • इससे पहले भारत से समझौते हो पाते, कश्मीर के पूंछ इलाके में एक बड़ा विद्रोह हो गया. इस विद्रोह का करण था, कि इस इलाके में पहले से कुछ भारतीय सैनिक रह रहे थे, जिन्होंने महाराजा हरि सिंह के सैनिकों से बगावत कर दी. महाराजा हरि सिंह के सैनिकों ने इन पर गोलीबारी की, जिससे कुछ लोगों की मृत्यु भी हो गयी. इस वजह से यह विद्रोह और भी अधिक बड़ा हो गया.
  • इसके बाद एक बहुत बड़ा विद्रोह था, जम्मू का दंगा. बंटवारे के समय देश में जगह जगह पर दंगे हो रहे थे. इसी तरह का एक दंगा जम्मू में हुआ. इस दंगे में यहाँ के मुसलामानों को मार कर भगाया जाने लगा. यहाँ के मुसलमान ख़ुद को बचाने के लिए पाकिस्तान जाने लगे.
  • उपरोक्त दो घटनाओ का हवाला देते हुए पाकिस्तान ने अपने तरफ से पश्तुन लड़ाकुओं को मोर्चे के लिए भेजा. इन सैनिकों ने 22 अक्टूबर को कश्मीर की घाटी में आक्रमण कर दिया. इस पर महाराजा हरी सिंह ने भारत से सैन्य मदद माँगी. इस पर भारत ने महाराजा हरिसिंह से भारत में शामिल होने का प्रस्ताव दिया. आक्रमण से बचने के लिए महाराजा ने भारत की ये बात मान ली और 26 अक्टूबर 1947 में भारत के ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेसन’ पर हस्ताक्षर किया. पाकिस्तान ने इस पर आपत्ति जताई और ये कहा कि ये संधि कश्मीर के लोगों की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ है. इस एक्सेसन को शेख अब्दुल्लाह ने भी स्वीकार किया.

इस एक्सेसन पर पाकिस्तान का रवैया सही नहीं रहा. इस पर उनका कहना था कि ये इंस्ट्रूमेंट हरी सिंह को दबाव में रख कर साइन कराया गया है, और इसमें कहीं भी कश्मीर के लोगों का कोई मत नहीं दिखाई देता है, किन्तु ये संधि पूरी तरह से कानूनी थी और इस पर अमल किया गया. इंस्ट्रूमेंट के अन्दर ये बात थी कि जब परिस्तिथियाँ ठीक होंगी तो लोगों का मत जाना जाएगा. आगे कश्मीर के भविष्य का निर्णय किया जाएगा. इस समय शेख अब्दुल्ला को इमरजेंसी ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन के पद पर महाराजा द्वारा नियुक्त किया गया ताकि वे स्तिथियाँ संभालें. इसके बाद महाराजा ने श्रीनगर छोड़ दिया और शासन से अलग हो गये. साल 1948 के युद्द के बाद शेख अब्दुल्लाह को कश्मीर का ‘प्रधानमन्त्री’ (उस समय कश्मीर में मुख्य मंत्री के पद पर आसीन व्यक्ति को प्रधानमन्त्री कहा जाता था) बनाया गया.

साल 1947-48 की लड़ाई (The First Kashmir War 1947-48)

इंस्ट्रूमेंट साइन होने के बाद भारत ने अपनी सेना को पाकिस्तान से लड़ने के लिए भेजा और इसी के साथ भारत पाकिस्तान की पहली कश्मीर की लड़ाई शुरू हुई. यह लड़ाई काफ़ी ऊंचाई पर लड़ी गयी थी, जहाँ पर भारतीय सेना को हेलीकाप्टर के सहारे भेजा गया था. इस लड़ाई में पाकिस्तानी आर्मी को मुँह की खानी पड़ी और भारतीय सेना उन्हें पीछे खदेड़ने में सफ़ल रही. इस लड़ाई में भारतीय सेना ने कश्मीर की घाटी को अपने कब्जे में कर लिया.

आज़ाद कश्मीर मुद्दा (Azad Kashmir Issue)

जिस समय ये लड़ाई चल रही थी, उस समय कश्मीर के पश्चिमी इलाके में जैसे पूँछ और बारामूला आदि क्षेत्रों में पाकिस्तान के सहारे एक कठपुतली सरकार बनायी गयी और इस क्षेत्र ने ख़ुद को स्वतंत्र घोषित करके ख़ुद को आज़ाद कश्मीर का नाम दिया. यह आज़ाद कश्मीर आज भी मौजूद है, जिसकी सरकार पाकिस्तान द्वारा चलती है. इस आज़ाद कश्मीर की राजधानी मुज़फ्फराबाद है. कश्मीर का उत्तरी इलाका जिसमे गिलगिट, बल्तिस्तान, मुज़फ्फराबाद, मीरपुर आदि क्षेत्र पाकिस्तान में पड़ने वाले कश्मीर में मौजूद हैं.

यूनाइटेड नेशन में कश्मीर समस्या (Kashmir Issue in UN)

इस समस्या को लेकर भारत जनवरी सन 1948 में यूनाइटेड नेशन गया. उस तरफ से पाकिस्तान भी इस मसले को लेकर यूनाइटेड नेशन पहुँचा. यहाँ पर कश्मीर समस्याओं को देखते हुए यूनाइटेड नेशन ने एक कमीशन बैठाया, जिसका नाम ‘यूनाइटेड नेशन कमीशन फॉर इंडिया एंड पाकिस्तान’ था, इसमें कुल पांच सदस्य शामिल थे. इन पाँचों लोगों ने भारत और कश्मीर का दौरा किया और इसका हल निकालने की कोशिश की. इस कोशिश से हालाँकि कोई रास्ता नहीं निकला. वैसे यूनाइटेड नेशन के इस कमीशन से एक रिसोल्यूशन अडॉप्ट किया गया. इस रिसोल्यूशन में तीन ‘कॉनसेक्युन्शल नॉन बाईन्डिंग स्टेप्स’ थे. कांसेक्युन्शल स्टेप्स का अर्थ है कि तीनों शर्तों में यदि पहली शर्त मानी गयी तो ही दूसरी शर्त मानी जायेगी. ये तीन रिसोल्युशन निम्नलिखित हैं;

  • पाकिस्तान को कश्मीर से अपनी सेनाएं तुरंत हटा लेनी चाहिए.
  • भारत को सिर्फ व्यवस्था बनाए रखने के लिए कम से कम सेना रख कर सभी आर्मी हटा लेनी चाहिए.
  • एक प्लेबिसाईट लोगों का मत जानने के लिए लागू किया जाएगा.

किन्तु पिछले 70 वर्षों में पाकिस्तान ने अपनी आर्मी कश्मीर से नहीं हटाई, जिस वजह से आगे की भी दो शर्तें नहीं मानी गयी. पाकिस्तान कहना है कि यदि उन्होंने फौज हटाई तो भारत उनके कश्मीर पर हमला करके अपने अधीन कर लेगा. भारत को भी यही डर है. इस तरह आज तक दोनों में से किसी देश ने भी अपनी सैन्य क्षमता यहाँ से नहीं हटाई है.

कश्मीर एलओसी (लाइन ऑफ़ कंट्रोल) (Kashmir LOC)

साल 1948 में सीज फायर हुआ था. सीज फायर यानि कि कुछ समय के लिए दोनों सेनाओं के बीच गोलीबारी रुक गयी. सीज फायर के समय डीफैक्टो बॉर्डर बना. तात्कालिक समय में यही बॉर्डर अंतर्राष्ट्रीय स्तर का काम कर रही है, किन्तु इसे अभी भी अंतर्राष्ट्रीय बॉर्डर नहीं कहा जाता. इसी को साल 1972 में एलओसी यानि लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल का नाम दिया गया. यह नाम शिमला एकॉर्ड में तय किया गया, साथ ही ये भी तय किया गया कि कश्मीर मसले को भारत और पाकिस्तान ख़ुद ही में बात करके सुलझाएंगे और इसमें किसी बाहरी देश अथवा यूएन का भी हस्तक्षेप नहीं होगा.

कश्मीर एलएसी (लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल) (Kashmir LAC)

कश्मीर का एक हिस्सा है अक्साईचिन, यहाँ पर चाइना का कण्ट्रोल है. भारत स्थित कश्मीर और चाइना के अक्साई चीन बॉर्डर को ही लाइन ऑफ़ एक्चुअल कण्ट्रोल यानि एलएसी कहा जाता है. चाइना ने साल 1962 में अक्साई चिन पर क़ब्ज़ा किया था. भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के बाद पाकिस्तान ने चीन की तरफ दोस्ती का हाथ बढाया और इस दोस्ती के एवज़ में पाकिस्तान ने चीन को कश्मीर का एक बहुत बड़ा हिस्सा दे दिया. इस हिस्से का नाम शक्सगाम वैली है. साल 1965 में पाकिस्तान ने चाइना को यह वैली तोहफे के रूप में दिया. यह बात शिमला एकॉर्ड के अनूसार ग़लत थी, क्योंकि पाकिस्तान ने कश्मीर के मसले में चीन को भी खींच लिया था. कालांतर में इससे दोनों देशों के बीच कश्मीर समझौते पर दिक्क़तें आ सकती थी. यह मामले में भारत और पाकिस्तान के बाद अब चीन भी इसमें शामिल हो गया.

कश्मीर में धारा 370 (Kashmir 370 Act)

आर्टिकल 370 भारतीय संविधान का आर्टिकल है न कि कश्मीर का संविधान का. इस आर्टिकल को शेख अब्दुल्लाह और गोपालस्वामी अयंगर ने मिल कर ड्राफ्ट किया था. इस धारा के तहत भारत के संविधान में कश्मीर को विशेष छूट दी गयी हैं. हालाँकि आर्टिकल में ‘टेम्पररीली’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जिससे ये पता चलता है कि दी गयी छूट अस्थायी है. ध्यान देने योग्य बात ये हैं कि जम्मू कश्मीर में क़ानून बनाने का अधिकाधिक अधिकार वहाँ की स्टेट असेंबली को है, यदि भारत की केंद्र सरकार वहाँ पर अपने बनाए गये क़ानून लागू कराना भी चाहती है, तो पहले उसे वहाँ के स्टेट असेंबली में पास कराना होता है. इसके अलावा कश्मीर में भारत के अन्य राज्यों में से कोई भी व्यक्ति जा कर स्थायी रूप से सेटल नहीं हो सकता है. वहाँ पर ज़मीन नहीं खरीदी जा सकती और घर नहीं बनाया जा सकता है.

धारा 370 पर सरदार वल्लभ भाई पटेल और और बाबा डॉ भीमराव आंबेडकर पूरी तरह ख़िलाफ़ थे. उन्होंने धारा 370 को ड्राफ्ट करने से इनकार कर दिया था. ध्यान देने वाली बात है कि बी आर आंबेडकर ने पूरा संविधान तैयार किया, किन्तु धारा 370 ड्राफ्ट करने से इनकार कर दिया.

6 अगस्त 2019 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने कश्मीर से धारा 370 और 35 A को हटाने का आदेश जारी कर दिया. मोदी सरकार का यह बहुत बड़ा कदम था, जिसे आजादी के बाद लिया गया. जम्मू कश्मीर की जनता में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. 31 अक्टूबर को केंद्र सरकार जम्मू काश्मीर एवं लदाख को 2 केंद्र शाषित प्रदेश बनाने की घोषणा कर दी. जिसके बाद अब भारत के 28 राज्य और 9 केंद्र शाषित प्रदेश हो गए है.

कश्मीर में होने वाले अन्य घटनाक्रम (Kashmir Other Stories)

धारा 370 लागू होने के बाद के घटनाक्रम निम्नलिखित है:

  • साल 1953 : शेख अब्दुल्ला को कश्मीर के प्रधानमन्त्री पद से हटा कर ग्यारह वर्ष के लिए जेल में डाल दिया गया. ऐसा माना जाता है कि केंद्र सरकार से अनबन की वजह से नेहरु ने इन्हें जेल में डलवाया था.
  • साल 1964 : साल 1964 में शेख अब्दुल्लाह जेल से बाहर आये और कश्मीर मुद्दे पर नेहरु से बात करने की कोशिश की, किन्तु इसी वर्ष नेहरु की मृत्यु हो गयी और बात हो नहीं सकी.
  • साल 1974 : साल 1974 में इंदिरा शेख एकॉर्ड हुआ, जिसके अंतर्गत शेख को जम्मू कश्मीर का मुख्यमंत्री बनाया गया. इस वर्ष ये भी निर्णय किया गया कि प्लेबिसाईट की ज़रुरत अब जम्मू कश्मीर में नहीं है क्योंकि ज़मीनी स्तर पर हकीकत पहले से अधिक बेहतर थी.
  • साल 1984 : इस वर्ष भारतीय आर्मी ने दुनिया के सबसे बड़े और ऊँचे ग्लेसियर और युद्द के मैदान को अपने कब्जे में कर लिया. इस समय भारतीय सेना को ऐसी खबर मिली थी कि पाकिस्तान सियाचिन पर क़ब्ज़ा कर रहा है. इस वजह से भारत ने भी चढ़ाई शुरू की और पाकिस्तान से पहले वहाँ पहुंच गया. सियाचिन बॉर्डर कूटनीति रूप से भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि यहाँ पर भारतीय सेना न हो, तो कश्मीर का चीनी क्षेत्र और पाकिस्तानी क्षेत्र मिल कर एक हो जाएगा. हालांकि सियाचिन पर क़ब्ज़ा करने के लिए पाकिस्तान ने कारगिल युद्ध भी किया.
  • साल 2019 (अगस्त) – काश्मीर के इतिहास में यह साल सुनहरे अक्षर में लिखा जायेगा. आजादी के बाद से जो कश्मीर भारत का हिस्सा रहते हुए भी पूर्ण रूप से भारत का हिस्सा नहीं था, उसे भारत का हिस्सा बनाया गया. अगस्त 2019 को प्रधानमंत्री मोदी जी एवं ग्रह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की और वहां से धारा 370 को हटा दिया. इस आदेश के बाद ही विपक्ष नेता ने इसका भरपूर विरोध किया, लेकिन मोदी सरकार ने सभी विपक्ष नेता जैसे महबूबा मुफ़्ती को सरकारी हिरासत में ले लिया. 
  • साल 2019 (अक्टूबर) – 31 अक्टूबर को केन्र्द सरकार ने काश्मीर और लदाख को 2 अलग-अलग केंद्र शाषित प्रदेश बनाने की घोषणा की. अब कश्मीर में भी बाकि राज्यों जैसे काम हो सकेंगें.

कश्मीर में मिलिटन्सी (Kashmir Militancy)

साल 1987 में कश्मीर के असेंबली चुनाव के दौरान नेशनल कांफ्रेंस और भारतीय कांग्रेस ने मिलकर बहुत भारी गड़बड़ी की और वहाँ इन्होने चुनाव जीता. चुनाव में बहुत भारी संख्या में जीते जाने पर दोनों पार्टियों के विरुद्ध काफ़ी प्रदर्शन हुए और धीरे धीरे ये प्रदर्शन आक्रामक और हिंसक हो गया. इस हिंसक प्रदर्शनों का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने इन्हीं प्रदर्शनकारियों में अपने हिज्ब उल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकवादी संगठन और जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के अलगाववादियों को शामिल कर दिया. इस वजह से ये स्थिति और बुरी होती चली गयी और इसे कश्मीर की आज़ादी से जोड़ कर लोगों के बीच लाया गया. युवा कश्मीरियों को सरहद पार भेज कर उन्हें आतंकी ट्रेनिंग दी जाने लगी. इस तरह के सभी आतंकी गतिविधियों को आईएसआई और अन्य विभिन्न संगठनों का समर्थन प्राप्त था.

कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की समस्या (Kashmiri Pandit Issue in Kashmir)

साल 1990 में कश्मीरी पंडितों को बहुत अधिक विरोध और हिंसा झेलनी पड़ी. कश्मीरी पंडित कश्मीर घाटी में एक अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय है. हालाँकि ये अल्पसंख्यक थे फिर भी इन्हें अच्छी नौकरियां प्रशासन में अच्छे पद पर आसीन थी, साथ ही ये बहुत अच्छे पढ़े लिखे थे. इस दौरान इनके ख़िलाफ़ कई धमकियां आनी शुरू हुईं और कई बड़े कश्मीरी पंडितों को सरेआम गोली मारी गयी. इन्हें दिन दहाड़े धमकियां दी जाने लगीं कि यदि इन्होने घाटी नहीं छोड़ा तो इन्हें जान से मार दिया जाएगा. किया भी कुछ ऐसा ही गया. लगभग 200 से 300 कश्मीरी पंडितों को 2 से 3 महीने के अन्दर मार दिया गया. इसके बाद ये धमकियाँ अखबारों में छपने लगीं कि कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ देना चाहिए साथ ही दिन रात लाउड स्पीकर से भी अन्नौंस करके उन्हें डराया जाने लगा. अंततः अपनी जान के डर से ये कश्मीरी पंडित जो कि लगभग 2.5 से 3 लाख की संख्या में थे, उन्हें रातोंरात घाटी छोड़ कर जम्मू या दिल्ली के लिए रवाना होना पड़ा.

इस घटना के पीछे एक वजह ये भी थी कि इस समय केंद्र सरकार ने जगमोहन को केंद्र का गवर्नर बनाया था. फारुक अबुद्ल्लाह ने कहा था कि यदि जगमोहन को गवर्नर बनाया गया तो, वे इस्तीफ़ा दे देंगे और इस पर फारुख ने इस्तीफ़ा दे दिया. कश्मीर में इसके बाद पूरी तरह से अव्यवस्था और अराजकता फ़ैल गयी थी. इस अराजकता में पड़े कश्मीरी पंडितों को अपना घर, अपने व्यापार आदि छोड़ कर जम्मू अथवा दिल्ली आना पड़ा. ये कश्मीरी पंडित आज तक विभिन्न कैंप में बहुत ग़रीबी में अपनी ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं.

कश्मीर में एएफ़एसपीए (आर्म्ड फ़ोर्स स्पेशल पॉवर एक्ट) (Kashmir AFSPA)

इस तरह की अराजकता को देखते हुए भारत सरकार ने यहाँ पर आर्म्ड फ़ोर्स स्पेशल पॉवर एक्ट लागू किया. यह भारत में पहली बार लागू नहीं हुआ था. इससे पहले कुछ उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में एएफएसपीए लागू किया जा चूका था. इस एक्ट के अनुसार सेना को कुछ अतिरिक्त पॉवर दिए जाते हैं, जिसकी सहायता से वे किसी को सिर्फ शक की बिनाह पर बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकते हैं, किसी पर संदेह होने से उसे गोली मार सकते है और किसी के घर की तलाशी भी बिना वारंट के ले सकते हैं. यह एक्ट इस समय कश्मीर को बचाने के लिए बहुत ज़रूरी था. इसके बाद धीरे धीरे हालात काबू में आने लगे फिर भी व्यवस्था स्थापित करने और मिलिटन्सी को ख़त्म के लिए 1990 से साल 2000 तक काउंटर इन्ट्रर्जेंसी चलाई. साल 2004 के बाद यहाँ पर मिलिटन्सी ख़त्म हुई. इस दस वर्षों में कई साड़ी घटनाएँ कश्मीर में हुईं. एलओसी के पार से बहुत सारे आतंकवादियों को भारत में लाया जाता रहा. ये आतंकी जम्मू और कश्मीर में आतंकी गतिविधियाँ करते थे, गोलीबारी और बम ब्लास्ट आदि करते थे. इस तरह ये पंद्रह साल कश्मीर की स्तिथि बहुत बुरी रही.

साल 2003 में भारत और पाकिस्तान के बीच एलओसी सीजफायर अग्रीमेंट पर साइन किया गया, जिसके तहत एलओसी पर गोलीबारी और घुसपैठ कम करने की बातें थीं. इस समय हालाँकि मिलिटन्सी कम हुई और घुसपैठ भी कम हुई है, किन्तु ख़त्म नहीं हुई. आये दिन ख़बरों में गोलिबारियों और सीज फायर के उल्लंघन की खबर आती ही रहती है.