‘आयरन लेडी ‘ श्रीमती इंदिरा गांधी की जीवनी ! ‘ Iron Lady’ Shrimati Indira Gandhi Biography in Hindi

‘आयरन लेडी ‘ श्रीमती इंदिरा गांधी की जीवनी ! ‘ Iron Lady’ Shrimati Indira Gandhi Biography in Hindi

इन्दिरा का जन्म 19 नवम्बर 1917 को राजनीतिक रूप से प्रभावशाली नेहरू परिवार में हुआ था। इनके पिता जवाहरलाल नेहरू और इनकी माता कमला नेहरू थीं।इन्दिरा को उनका “गांधी” उपनाम फिरोज़ गाँधी से विवाह के पश्चात मिला था। इनका मोहनदास करमचंद गाँधी से न तो खून का और न ही शादी के द्वारा कोई रिश्ता था। इनके पितामह मोतीलाल नेहरू एक प्रमुख भारतीय राष्ट्रवादी नेता थे। इनके पिता जवाहरलाल नेहरू भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के एक प्रमुख व्यक्तित्व थे और आज़ाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री रहे।

        1934–35 में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के पश्चात, इन्दिरा ने शान्तिनिकेतन में रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा निर्मित विश्व-भारती विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ही इन्हे “प्रियदर्शिनी” नाम दिया था। इसके पश्चात यह इंग्लैंड चली गईं और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में बैठीं, परन्तु यह उसमे विफल रहीं और ब्रिस्टल के बैडमिंटन स्कूल में कुछ महीने बिताने के पश्चात, 1937 में परीक्षा में सफल होने के बाद इन्होने सोमरविल कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में दाखिला लिया। इस समय के दौरान इनकी अक्सर फिरोज़ गाँधी से मुलाकात होती थी, जिन्हे यह इलाहाबाद से जानती थीं और जो लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में अध्ययन कर रहे थे। अंततः 16 मार्च 1942 को आनंद भवन, इलाहाबाद में एक निजी आदि धर्म ब्रह्म-वैदिक समारोह में इनका विवाह फिरोज़ से हुआ।

आरम्भिक जीवन :

        इंदिरा गाँधी का जन्म इंदिरा नेहरु के नाम से कश्मीरी पंडित परिवार में 19 नवम्बर 1917 को अल्लाहाबाद में हुआ। उनके पिता जवाहरलाल नेहरु, एक बड़े राजनेता थे जिन्होंने स्वतंत्रता पाने के लोए अंग्रेजो से राजनैतिक स्तर पर लड़ाई की थी। फिर वे अपने राज्य संघ के प्रधानमंत्री और बाद में भारत के प्रधानमंत्री नियुक्त हुए। इंदिरा, जवाहरलाल नेहरु की अकेली बेटी थी (उसे एक छोटा भाई भी था, लेकिन वो बचपन में ही मारा गया) जो अपनी माता कमला नेहरु के साथ आनंद भवन में बड़ी हुई। जहा अल्लाहाबाद में उनके परिवार की बहोत संपत्ति थी। इंदिरा का बचपन बहोत नाराज़ और अकेलेपन से भरा पड़ा था। उनके पिता राजनैतिक होने के वजह से कई दिनों से या तो घर से बाहर रहते और या तो जेल में बंद रहते, उनकी माता को बिमारी होने की वजह से वह पलंग पर ही रहती थी। और बाद में उनकी माता को जल्दी ही ट्यूबरकुलोसिस की वजह से मृत्यु प्राप्त हुई। और इंदिरा का अपने पिताजी के साथ बहोत कम संबंध था, ज्यादातर वे पत्र व्यवहार ही रखते थे।

        इंदिरा जी को ज्यादातर घर पर ही पढाया जाता था और रुक-रुक कर कभी-कभी वह मेट्रिक के लिए स्कूल चले भी जाती। वो दिल्ली में मॉडर्न स्कूल, सेंट ससिल्लिया और सेंट मैरी क्रिस्चियन कान्वेंट स्कूल, अल्लाहाबाद की विद्यार्थी रह चुकी है। साथ भी एकोले इंटरनेशनल, जिनेवा, एकोले नौवेल्ले, बेक्स और पुपिल्स ओन स्कूल, पुन और बॉम्बे की भी विद्यार्थिनी रह चुकी है। बाद में वो पढने के लिए शान्तिनिकेतन के विश्वा भारती महाविद्यालय गयी। और उनके साक्षात्कार के समय ही रबिन्द्रनाथ टैगोर ने उनका नाम प्रियदर्शिनी रखा और तभी से वह इंदिरा प्रियदर्शिनी नेहरु के नाम से पहचानी गयी।

स्वतंत्रता आंदोलन में इंदिरा गांधी जी की भूमिका – Indira Gandhi As Freedom Fighter

इंदिरा गांधी जी अंदर बचपन से ही देशभक्ति की भावना निहित थी। दरअसल, उनके पिता और दादा जी दोनों ही देश के महान स्वतंत्रता सेनानी थे।

शुरू से ही देशप्रेम की भावना से प्रेरित परिवार में जन्म लेने से इंदिरा गांधी जी पर इसका गहरा असर पड़ा था। वे अपने पढ़ाई के दौरान ही इंडियन लीग की सदस्य बन गईं थीं और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई के बाद जब वे साल 1941 में भारत वापस लौंटी तो फिर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गईं।

यही नहीं स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्हें जेल की यातनाएं भी सहनी पड़ी थी। इंदिरा गांधी एक देशप्रेमी थी। देशसेवा उनमे कूट-कूट के भरी थी। वह हमेशा कहती थी,

आपको गतिविधि के समय स्थिर रहना और विश्राम के समय क्रियाशील रहना सीख लेना चाहिये।

मतलब इंसान को कोई भी काम करते समय वो सचेत दिमाग से करना चाहिये। जीवन में क्रियाशील होने के साथ-साथ विश्राम भी जरुरी होता है ताकि हम हमारे दिमाग को और अधिक क्रियाशील बना सके।

इंदिरा गांधी का राजनैतिक करियर – Indira Gandhi Political Career

इंदिरा गांधी जी का परिवार देश के सबसे प्रमुख एवं प्रसिद्ध राजनैतिक परिवारों में से एक है, इसलिए इंदिरा गांधी जी की भी शुरु से हीराजनीति की तरफ दिलचस्पी कोई हैरान करने वाली बात नहीं है।

जब उनके पिता जी जवाहर लाल नेहरू जी स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रुप में नियुक्त हुए थे। तब से ही उनके घर में आजादी के महानायक महात्मा गांधी समेत कई बड़े राजनेताओं का उनके घर में आना-जाना था, जिसकी मेजबानी अक्सर इंदिरा गांधी जी ही करती थी।

इस दौरान कई बार वे अपने पिता जी और राजनैतिक आगंतुकों द्वारा देश के विकास एवं बेहतर भविष्य के लिए हो रही बातचीत को भी ध्यानपूर्वक सुनती थी, जिसके चलते धीमे-धीमे उनका मन भी राजनीति की तरफ लगने लगा था।

वहीं साल 1951 और 1952 के बीच हुए लोकसभा चुनावों के दौरान इंदिरा गांधी जी ने अपने पति फिरोज गांधी जी के कई चुनावी रैली और सभाओं का आयोजित करने की जिम्मेदारी अच्छी तरह संभाली थी।

इसके बाद साल 1955 में इंदिरा गांधी जी को कांग्रेस पार्टी की कार्यकारिणी के रुप में शामिल कर लिया था। यही नहीं इंदिरा गांधी जी की राजनैतिक समझ को परखते हुए नेहरू जी भी न सिर्फ अपनी बेटी इंदिरा से कई अहम मुद्दों पर राजनैतिक सलाह लेते थे, बल्कि उन पर अमल भी करते थे।

इसके बाद साल 1959 में इंदिरा गांधी जी कांग्रेस की प्रेसीडेंट के रुप में नियुक्त हुईं।

फिर साल 1964 में अपने पिता एवं देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जी की मौत के बाद उन्हें लाल बहादुर शास्त्री जी के सरकार के समय सूचना और प्रसारण मंत्री बना दिया गया था।

इस पद की जिम्मेदारी भी इंदिरा गांधी जी ने बखूबी निभाई एवं आकाशवाणी के कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया। साल 1965 में  भारत-पाकिस्तान के युद्ध के दौरान आकाशवाणी राष्ट्रीयता की भावना को मजबूत करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इसके अलावा इस युद्ध के दौरान उन्होंने सकुशल नेतृत्व किया एवं सीमाओं पर जाकर भारतीय सेना के जवानों का हौसला भी बढ़ाया।

देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री के रुप में इंदिरा गांधी जी – Indira Gandhi As Prime Minister

इंदिरा गांधी जी महिला सशक्तिकरण का भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण रही हैं।

उन्होंने प्रधानमंत्री के रुप में देश का 4 बार कुशल नेतृत्व किया एवं देश के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। साल 1966 से 1977 तक लगभग 11 साल वे लगातार 3 बार प्रधानमंत्री के पद पर कार्यरत रहीं।

फिर साल 1980 से 1984 में उन्हें चौथी बार देश का प्रधानमंत्री बनने का गौरव हासिल हुआ।

आपको बता दें कि पहली बार 1966 में देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की अचानक मौत के बाद, कांग्रेस के अध्यक्ष के. कामराज जी ने इंदिरा गांधी जी को देश के प्रधानमंत्री बनने की सलाह दी।

हालांकि इस दौरान कांग्रेस पार्टी के जाने-माने एवं कद्दावर नेता मोरारजी देसाई खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते थे, फिर पार्टी द्धार वोटिंग के बाद इंदिरा गांधी जी को देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री के रुप में नियुक्त किया गया।

इस तरह 24 जनवरी 1966 को इंदिरा गांधी जी ने देश की प्रधानमंत्री के रुप में शपथ ली। फिर इसके करीब एक साल बाद 1967 में हुए लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी जी फिर से पीएम उम्मीदवार के रुप में खड़ी हुईं।

इस चुनाव में वे ज्यादा बहुमत तो हासिल नहीं कर पाईं लेकिन चुनाव जीतने में सफल रहीं और फिर से उन्हें देश के प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला। हालांकि, इस दौरान मोरार जी देसाई और इंदिरा गांधी जी को लेकर कांग्रेस पार्टी के अंदर कई आपसी मतभेद हो गए।

दरअसल, पार्टी के कुछ बड़े नेता जहां इंदिरा गांधी जी का समर्थन कर रहे थे तो कुछ मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री के रुप में चाहते थे, जिसके चलते साल 1969 में कांग्रेस पार्टी दो अलग-अलग गुटों में बंट गई।

प्रधानमंत्री के अपने कार्यकाल के दौरान इंदिरा गांधी जी ने देश के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण काम किए। उन्होंने साल 1969 में भारत के 14 सबसे बड़े बैंकों के राष्ट्रीयकरण करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1971 में इंदिरा गांधी जी द्वारा मध्याविधि चुनाव की घोषणा – 1971 Election

साल 1971 में इंदिरा गांधी जी ने कांग्रेस की बिगड़ती हालत को देख एवं देश में अपनी स्थिति और अधिक मजबूत करने के लिए मध्याविधि चुनाव को घोषणा कर विपक्ष को बड़ा झटका दे दिया।

अपनी राजनैतिक कौशल के लिए पहचानी जानी वाली इंदिरा गांधी जी ”देश से गरीबी हटाओ” के नारे के साथ इस चुनाव में उतरीं और देश में चुनावी महौल बनाकर 518 में से 352 सीटें हासिल कर अपनी सरकार बनाने में सफल रहीं।

इस चुनाव के बाद देश में इंदिरा गांधी जी की स्थिति काफी मजबूत हो गई थी।

भारत-पाक के युद्ध में इंदिरा गांधी जी का सकुशल नेतृत्व – India Pakistan War

इंदिरा गांधी जी के प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान 1971 में  बांग्लादेश के मुद्दे को लेकर जब भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ, उस दौरान देश में काफी तनाव बढ़ गया और इंदिरा गांधी जी को भी काफी बड़े संकट से जूझना पड़ा।

हालांकि इस दौरान उन्होंने सूझबझ और समझदारी से काम लेते हुए देश का सकुशल नेतृत्व किया। आपको बता दें कि युद्ध के दौरान जब स्थिति और भी ज्यादा गंभीर हो गई जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाक का समर्थन देना शुरु कर दिया और चीन पहले से ही पाकिस्तान को हथियार सप्लाई कर उसका समर्थन कर रहा था।

इसके बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व ने भारत ने सोवियत संघ के साथ ”शांति, दोस्ती और सहयोग की संधि” पर हस्ताक्षर किए।

इस दौरान पूर्वी पाकिस्तान से भारी संख्या में शरणार्थियों ने भारत में प्रवेश करना शुरु कर दिया।

इस दौरान इंदिरा गांधी जी ने न सिर्फ लाखों शरणार्थियों को भारत में शरण दी बल्कि पश्चिमी पाकिस्तान से लड़ने के लिए सैन्य सहायता भी प्रदान की।

इंस दौरान इंदिरा गांधी जी ने बांग्लादेश की स्वतंत्रता के महत्व को समझते हुए बांग्लादेश के निर्माण को समर्थन देने की घोषणा की। वहीं इसके बाद 16 दिसंबर को पश्चिमी पाकिस्तान ने आत्मसमर्पण कर दिया, जिसके चलते बांग्लादेश का निर्माण हुआ।

इस युद्ध में भारत की जीत से इंदिरा गांधी जी की छवि एक लोकप्रिय राजनेता के रुप में बन गई एवं उनकी स्थिति देश में इतनी अधिक मजबूत हो गई कि वे स्वतंत्र फैसले लेने के लिए भी सक्षम हो गईं।

वहीं इस युद्ध के बाद इंदिरा गांधी जी ने खुद को पूरी तरह देश की सेवा और विकास में समर्पित कर दिया।

उन्होंने साल 1972 में बीमा और कोयला उद्योग का भी राष्ट्रीयकरण कर जनता का ध्यान अपनी तरफ खींचा एवं एक सक्रिय एवं कुशल राजनेता के रुप में समाज कल्याण, अर्थ जगत समेत भूमि सुधार के लिए कई सुधार काम किए।

इंदिरा गांधी जी द्वारा देश में आपातकाल लागू करना एवं सत्ता छिनना – Emergency In India

इंदिरा गांधी जी ने अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान देश के विकास के लिए कई नई योजनाएं लागू की थी एवं कई काम करवाए थे, लेकिन 1975 के दौरान देश में महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक संकट, भ्रष्टाचार, की समस्याए काफी बढ़ गई थी, जिसके चलते कई विपक्षी दलों और देश की जनता ने इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ कई विरोध प्रदर्शन किए थे।

वहीं इसी दौरान इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी इंदिरा गांधी जी के चुनाव से संबंधित एक केस पर फैसला सुनाते हुए उनका चुनाव रद्द करने के साथ 6 साल तक उनका चुनाव लड़ने से भी बैन लगा दिया।

जिसके बाद देश के राजनैतिक हालात और भी अधिक खराब हो गए और लोगों के अंदर उनके खिलाफ और अधिक प्रतिशोध भर गया।

फिर 26 जून, 1975 के दिन इंदिरा गांधी जी ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने की बजाय देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। जिसके तहत उन्होंने मोरारजी देसाई, जयप्रकाश नारायण समेत तमाम विपक्षी नेता और उनके राजनैतिक दुश्मनों को गिरफ्तार कर लिया गया।

यही नहीं आपातकाल के दौरान आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकार भी छीन लिए गए एवं मीडिया पर भी प्रतिबंध लगा दिया, रेडियो अखबार और टीवी पर सेंसर लगा दिए गए।

फिर इसके बाद साल 1977 की शुरुआत में इंदिरा गांधी जी ने आपातकाल को हटाते हुए चुनाव की घोषणा कर दी।

इस दौरान राजनैतिक कैदियों की रिहाई कर दी गईं एवं फिर से मीडिया से बैन हटा दिया था एवं जनता को मौलिक अधिकार वापस देने के साथ राजनैतिक सभाओं और चुनाव प्रचार की आजादी दे गई।

हालांकि इस चुनाव के दौरान आपातकाल और नसबंदी अभियान के चलते आम जनता में उनके खिलाफ काफी क्रोध बढ़ गया था।

वहीं उस दौरान जनता ने आपातकाल और नसबंदी अभियान के बदले में इंदिरा गांधी जी को समर्थन नहीं किया। जिसके परिणाम स्वरुप, मोरारजी देसाई और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में ”जनता पार्टी” एक सशक्त एवं मजबूत होकर सामने आईं एवं चुनाव में 542 में 330 सीटें हासिल कीं, जबकि इंदिरा गांधी जी के खेमे में सिर्फ 153 सीटें ही आईं।

जनता पार्टी की आंतरिक कलह और इंदिरा गांधी जी की सत्ता में फिर से वापसी:

साल 1979 में जनता पार्टी के अंदर आंतरिक कलह की वजह से यह सरकार गिर गई जिसका फायदा इंदिरा गांधी जी को हुआ।

दरअसल, जनता पार्टी के राजनेताओं ने इंदिरा गांधी जी को संसद से बाहर निकालने के मकसद से इंदिरा गांधी जी पर कई गंभीर आरोप लगाए थे एवं भ्रष्टाचार के आरोप में इंदिरा गांधी जी को जेल भी भेजा गया था।

वहीं जनता पार्टी की यह रणनीति और इंदिरा गांधी जी के प्रति ऐसा रवैया जनता को रास नहीं आया और फिर भारी संख्या में आम जनता इंदिरा गांधी जी के समर्थन में आ गई और फिर साल 1980 के चुनाव के दौरान कांग्रेस ने 592 में से 353 सीटें हासिल की और इंदिरा गांधी ने बड़े बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की और  एक बार फिर उन्हें देश के प्रधानमंत्री के रुप में देश का नेतृत्व करने का मौका मिला।

इंदिरा गांधी के नाम पर धरोहर – Indira Gandhi Memorial

नई दिल्ली में उनके नाम पर इंदिरा गांधी मेमोरियल म्यूजियम बना हुआ है।

इसके अलावा इंदिरा गांधी जी के नाम पर इंदिरा गांधी नेशनल ट्राइबल यूनिवर्सिटी(अमरकंटक), इंदिरा गांधी टेक्निकल यूनिवर्सिटी फॉर वीमेन, इंदिरा गांधी इंस्टिटयूट ऑफ टेक्नोलॉजी, इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी (इग्नू), इंदिरा गांधी इंस्टीटयूट ऑफ डेंटल साइंस समेत कई शिक्षण संस्थान हैं।

यही नहीं देश के कई शहरों में बहुत सी सड़कों और चौराहों के नाम भी इंदिरा गांधी जी के नाम पर है।

इसके अलावा देश की राजधानी दिल्ली के इंटरनेशनल एयरपोर्ट का नाम भी इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट है और देश के सबसे मुख्य समुद्री ब्रिज पंबन ब्रिज का नाम भी इंदिरा गांधी रोड ब्रिज है।

इंदिरा गांधी को मिले पुरस्कार और सम्मान – Indira Gandhi Awards

देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी को साल 1971 में देश के सर्वोच्च सम्मान ”भारत रत्न” से सम्मानित किया गया था।

साल 1972 में उन्हें बांग्लादेश को आजाद करवाने के लिए मेक्सिकन अवॉर्ड से नवाजा गया।

साल 1976 में उन्हें नागरी प्रचारिणी सभा के द्वारा हिन्दी में साहित्य वाचस्पति सम्मान से नवाजा गया था।

इसके अलावा उन्हें मदर्स अवार्ड, हॉलैंड मेमोरियल प्राइज से भी सम्मानित किया गया था।

ऑपरेशन ब्लू स्टार और इंदिरा गांधी जी की हत्या – Indira Gandhi Death

1981 में एक सिख आतंकवादी समूह ”खालिस्तान” की मांग को लेकर अमृतसर के प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर एवं हरिमिंदर साहिब परिसर के अंदर प्रवेश कर गए थे।

मंदिर परिसर में हजारों लोग होने के बाबजूद भी इंदिरा गांधी जी ने सेना के जवानों को इन आतंकवादियों से निपटने के लिए सिखों के प्रमुख धार्मिक स्थल ऑपरेशन ब्लू स्टार करने की इजाजत दे दी।

वहीं ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान हजारों बेकसूरों और मासूमों की जान चली गईं एवं सिख समुदाय की धार्मिक आस्था को काफी ठेस पहुंची।

इस ऑपरेशन के बाद इंदिरा गांधी जी के खिलाफ विद्रोह की भावना भड़क उठी एवं देश में संप्रदायिक तनाव की स्थिति बन गई, यही नहीं सिख समुदाय के कई लोगों ने इस दौरान सरकारी पदों से इस्तीफा दे दिया एवं सरकारी पुरस्कार एवं उपाधियां वापस कर विरोध जताया।

इस तरफ एक बार फिर से इंदिरा गांधी जी की राजनैतिक छवि काफी खराब हो गई एवं इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

दरअसल, गोल्डन टेंपल में हुए भयावह नरसंहार का बदला लेने के लिए इंदिरा गांधी जी के दो सिख बॉडीगार्ड सतवंत सिंह और बित सिंह ने 31 अक्टूबर, 1984 को इंदिरा गांधी जी की गोली मारकर हत्या कर दी।

इंदिरा गाँधी से जुडी रोचक बातें

  • ये माना जाता हैं कि इंदिरा गांधी अपनी इमेज बनाए रखने पर काफी ध्यान देती थी. 1965 के दौरान भारत-पाकिस्तान के युध्द के समय वो श्रीनगर में छुट्टियाँ मना रही थी. सुरक्षा अधिकारी के ये बताने पर कि पाकिस्तान उनके होटल के काफी करीब आ गये हैं, वो ये जानने के बावजूद भी वो वही रुकी रही. गांधी ने वहाँ से हटने से मना कर दिया, इस बात ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खीचा, जिससे विश्व पटल पर उनकी पहचान वो भारत की सशक्त महिला के रूप में बनी.
  • केथरीन फ्रैंक ने अपनी किताब “दी लाइफ ऑफ़ इंदिरा नेहरु गाँधी” में लिखा हैं कि इंदिरा का पहला प्यार शान्ति निकेतन में उनके जर्मन टीचर थे, उसके बाद जवाहर लाल नेहरु के सेक्रेटरी एम.ओ.मथाई ( O. Mathai) से उनके निकट-संबंध रहे. उसके बाद उनका नाम योग के अध्यापक धीरेन्द्र ब्रह्मचारी और आखिर में कांग्रेस नेता दिनेश सिंह के साथ भी जोड़ा गया. लेकिन इन सबसे भी इंदिरा के विरोधी उनकी राजनीतिक छवि को नुक्सान नही पहुंचा सके,और उनके आगे बढने का मार्ग नही रोक सके.
  • 1980 में संजय की प्लेन क्रैश में मृत्यु के बाद गांधी परिवार में तनाव बढ़ गया था और 1982 तक आते आते इंदिरा और मेनका गांधी के मध्य कडवाहट काफी बढ़ गयी. इस कारण इंदिरा ने मेनका को घर छोड़ने का कह दिया, लेकिन मेनका ने भी बैग के साथ अपने घर छोडकर जाते समय की फोटो मीडिया में दे दी. और जनता के समाने ये घोषणा भी की, उन्हें नहीं पता कि उन्हें घर से क्यों निकाला जा रहा हैं. वो अपनी माँ से भी ज्यादा अपनी सास इंदिरा को मानती रही हैं. मेनका अपने साथ अपना पुत्र वरुण भी लेकर गयी थी और इंदिरा के लिए अपने पोते से दूर होना काफी मुश्किल रहा था.
  • 20 वी शताब्दी में महिला नेताओं की संख्या कम थी, जिनमें इंदिरा का नाम शामिल था. लेकिन फिर भी इंदिरा की एक मित्र थी मार्गरेट थैचर. ये दोनों 1976 में मिली थी. और ये जानते हुए भी की इंदिरा पर आपतकाल के दौरान तानाशाही का इल्जाम हैं और वो अगला चुनाव हार गयी हैं, मार्गरेट ने इंदिरा का साथ नही छोड़ा. ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर इंदिरा की समस्याओं को अच्छे से समझती थी. थैचर भी इंदिरा की तरह ही बहादुर एवं सशक्त प्रधानमंत्री थी, जिसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता हैं कि आतंकी हमले की आशंका होते हुए भी वो इंदिरा के अंतिम-संस्कार में आई थी. उन्होंने इंदिरा की आसामयिक मृत्यु पर राजीव को संवेदनशील पत्र भी लिखा था.
  • इंदिरा के प्रधानमंत्री बनने पर कांग्रेस में ही एक वर्ग था, जो किसी महिला के हाथ में शक्ति को बर्दाश्त नहीं कर सकता था, फिर भी इंदिरा ने ऐसे सभी व्यक्तियों और पारम्परिक सोच के कारण राजनीति में आने वाली समस्त बाधाओं का डटकर सामना किया.
  • इंदिरा ने देश में कृषि के क्षेत्र में काफी सराहनीय काम किये थे, इसके लिए उन्होंने बहुत सी नई योजनाएं बनाई और कृषि सम्बंधित कार्यक्रम आयोजित किए. इसमें विविध फसलें उगाना और खाध्य सामग्री को निर्यात करना जैसे मुख्य उद्देश्य शामिल थे. उनका लक्ष्य देश में रोजगार सम्बंधित समस्या को कम करना और अनाज उत्पादन में आत्म-निर्भर बनना था. इन सबसे ही हरित-क्रान्ति की शुरुआत हुई थी.
  • इंदिरा गांधी ने भारत को आर्थिक और औद्योगिक सक्षम राष्ट्र बनाया था, इसके अलावा उनके कार्यकाल में ही विज्ञान और रिसर्च में भी भारत ने बहुत प्रगति की थी. उस दौरान ही पहली बार एक भारतीय ने चाँद पर कदम रखा था,जो कि देश के लिए काफी गर्व का विषय था.

इंदिरा और फिरोज का रिश्ता कैसा था

इंदिरा गांधी की बायोग्राफी में हमें लिखा हुआ मिलता है की इंदिरा और फिरोज का रिश्ता काफी अच्छा नहीं था. उनके मतभेद इतने बढ़ गये थे की इंदिरा और फिरोज अलग रहने लग गये थे. यहाँ तक की फिरोज एक मुस्लिम महिला के प्यार में भी पड़ गये थे. उस समय इंदिरा दूसरी बार गर्भवती थी. लेकिन फिरोज के अंतिम समय में इंदिरा उनके काफी नजदीक थी और दोनों का रिश्ता लड़ते-झगड़ते गुजरा. उनके राजनैतिक मतभेद के बारें में अनेक जगहों एंव किताबों में लिखा हुआ मिलता है.

इंदिरा गांधी पर पुस्तकें

Indira Gandhi: A Biography, Pupul Jaykar, 1988

Indira Gandhi: Return of The Red Rose (1966); That Woman: Her Seven Years in Power (1973); Indira Gandhi: The Last Post (1985), Khwaja Ahmad Abbas

Indira: The Life of Indira Nehru Gandhi, Katherine Frank (2001)

Indira Gandhi: Tryst With Power, Nayantara Sahgal (1982)

Mrs Gandhi, Dom Moraes (1980)