हाइफा मुक्ति युद्ध

हाइफा मुक्ति युद्ध

कहाँ है हाइफा?

Haifa City

हाइफ़ा उत्तरी इजराइल का सबसे बड़ा नगर तथा इजराइल का तीसरा सबसे बड़ा नगर है। इसकी जनसंख्या लगभग तीन लाख है। इसके अलावा लगभग तीन लाख लोग इसके समीपवर्ती नगरों में रहते हैं। इसी नगर में बहाई विश्व केन्द्र भी है जो यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत घोषित है।

हाइफा युद्ध और हिंदुस्तान से कनेक्शन :

प्रथम विश्वयुद्ध के वक़्त इस शहर पर जर्मनी, ओटोमन साम्राज्य और ऑस्ट्रिया का कब्जा था!! प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के दौरान उस्मानी तुर्कियों की सेनाओं ने हैफा शहर में घुसपैठ की। सेनाएँ हैफा के यहूदियों पर अत्याचार कर रही थी।

वो साल 1918 था. पहला विश्व युद्ध उसी साल नवंबर में खत्म हुआ था, लेकिन उससे पहले बारूद की गंध दुनिया के आखिरी इंसान तक पहुंच चुकी थी. तब तक यहूदियों का देश इस्राइल नहीं बना था. इस्राइल भारत के आजाद होने के कुछ ही महीनों बाद 1948 में बना था. तो 1918 के सितंबर महीने में ब्रिटिश झंडा थामे लड़ रहे सैनिक समंदर किनारे बसे शहर हाइफा में बहाई समुदाय के आध्यात्यमिक गुरु अब्दुल बहा को रिहा कराने की योजना बना रहे थे.झंडा ब्रिटेन का था, लेकिन वो सैनिक भारतीय थे. भारत की तीन रियासतों- मैसूर, जोधपुर और हैदराबाद के सैनिक, जिन्हें अंग्रेजों की तरफ से जर्मन और तुर्की सेना के खिलाफ लड़ने के लिए भेजा गया था. हाइफा पर जर्मन और तुर्की सेना का कब्जा था. अपने रेल नेटवर्क और बंदरगाह की वजह से हाइफा रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण जगह थी, जो युद्ध के लिए सामान भेजने के काम भी आती थी. भारतीय सैनिकों को हाइफा, नाजेरथ और दमश्कस को जर्मन-तुर्की सेना के कब्जे से आजाद कराना था, जो आज इस्राइल और सीरिया में हैं.

23 सितंबर 1918. हाइफा के अंदर मशीन गन और उस जमाने के सबसे आधुनिक हथियारों के साथ जर्मन और तुर्की सैनिक तैयार खड़े थे. उनके सामने थे जोधपुर और मैसूर के सैनिक, जिनके पास कोई ऑटोमेटिक हथियार नहीं थे. घोड़ों पर सवार वो सैनिक हाथ में भाले और तलवारें लिए खड़े थे. आज सोचें, तो उस दिन लड़ाई का कोई मतलब ही नहीं था. घोड़े कितने भी तेज होते, पर गोलियों से तेज तो नहीं. ऐसी किसी भी लड़ाई के अंत में घुड़सवार सेना को छलनी कर दिया जाना था, पर उस दिन नहीं. उस दिन इतिहास लिखा जाना था. उस दिन दुनिया को एक घुड़सवार सेना के वो पराक्रम देखना था, जो इतिहास में कभी दोहराया नहीं जा सका!

जर्मन और तुर्की सैनिकों के कुछ समझने से पहले ही 15वीं (इम्पीरियल सर्विस) घुड़सवार ब्रिगेड ने दोपहर 2 बजे हाइफा पर धावा बोल दिया. जोधपुर के सैनिक माउंट कार्मेल की ढलानों से हमला कर रहे थे. वहीं मैसूर के सैनिकों ने पर्वत के उत्तरी तरफ से हमला किया. सेना के एक कमांडर कर्नल ठाकुर दलपत सिंह लड़ाई की शुरुआत में ही मारे गए, जिसके बाद उनके डिप्टी बहादुर अमन सिंह जोधा आगे आए. मैसूर रेजिमेंट ने दो मशीन-गनों पर कब्जा करके अपनी पोजीशन सुरक्षित कर ली और हाइफा में घुसने का रास्ता साफ कर दिया.

इसके बाद शुरू हुई सीधी लड़ाई. एक तरफ घोड़े और दूसरी तरफ गोलियां. यही वो दृश्य था, जिसकी कल्पना करके ब्रिटिश जनरल एडमंड एलेनबी भारतीय सैनिकों को युद्ध सी पीछे हटाना चाहते थे, लेकिन सैनिक ठहरे सैनिक. पहलवानों सी फितरत. हार पता होने के बावजूद मैदान में आकर लौट जाने का तो सवाल ही नहीं उठता. दिनभर के युद्ध के बाद भारतीय सैनिकों ने हाइफा को 400 साल पुराने ऑटोमन साम्राज्य से आजादी दिला दी. ऑफीशियल हिस्ट्री ऑफ दि ग्रेट वॉर में लिखा गया,

‘पूरे कैंपेन (वर्ल्ड वॉर) में इस स्तर का युद्ध किसी घुड़सवार सेना ने नहीं लड़ा. मशीन गन से लगातार निकल रहीं गोलियों ने घोड़ों को घायल जरूर किया, तो वो उन्हें रोक नहीं पाईं.’

हाइफा को कब्जे में लेकर भारतीय सैनिकों ने 1350 जर्मन और तुर्की सैनिकों को बंदी बनाया था, जिनमें से दो जर्मन अफसर और 35 तुर्की अफसर थे. वहां 17 आर्टिलरी गन और 11 मशीन गन कैप्चर की गईं. इस युद्ध में आठ भारतीय सैनिक मारे गए थे और 34 घायल हुए थे. वहीं 60 घोड़े मारे गए थे और 83 घायल हुए थे. हाइफा में भारतीयों के लिए कब्रिस्तान बनाया गया, जो 1920 तक इस्तेमाल किया जाता रहा. भारत में इन सैनिकों की वीरता की याद में 1922 में तीन मूर्ति स्मारक बनाया गया.

ठाकुर दलपत सिंह ने दिया बलिदान:

ठाकुर दलपत सिंह

हैफा की स्वतंत्रता के लिए लड़े गए युद्ध की अगुवाई जोधपुर लांसर्स के मेजर ठाकुर दलपत सिंह शेखावत कर रहे थे। यद्यपि इस युद्ध में ठाकुर ने अपना बलिदान देकर एक सच्चे सैनिक का परिचय दिया। ठाकुर दलपत सिंह शेखावत राजस्थान में पाली जिले के देवली पाबूजी के रहने वाले थे। शेखावत 18 साल की उम्र में वे जोधपुर लांसर में बतौर घुड़सवार भर्ती हुए और बाद में मेजर बने। उनकी उसी बहादुरी को सम्मानित करते हुए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें मरणोपरांत मिलिटरी क्रॉस मेडल (Military Cross Medal) से सम्मानित किया। ब्रिटिश सेना के एक बड़े अधिकारी कर्नल हार्वी ने उनकी याद में कहा था, “उनकी मृत्यु केवल जोधपुर वालों के लिए ही नहीं, बल्कि भारत और पूरे ब्रिटिश साम्राज्य के लिए एक बड़ी क्षति है।” मेजर ठाकुर दलपत सिंह के अलावा कैप्टन अनूप सिंह और लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह को भी मिलिटरी क्रॉस पदक दिया गया था। इस युद्ध में कैप्टन बहादुर अमन सिंह जोधा और दफादार जोर सिंह को भी उनकी बहादुरी के लिए इंडियन ऑर्डर ऑफ़ मेरिट (Indian Order of Merit) पदक से सम्मानित किया गया था।

पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निवास स्थल तीन मूर्ति भवन से रिश्ता:

तीन मूर्ति प्रतिमा

राजधानी दिल्ली में तीन मूर्ति भवन (Teen Murti Bhavan) के सामने की सड़क के बीच लगी तीन सैनिकों की मूर्तियाँ उन्हीं तीन घुड़सवार रेजीमेंटों की प्रतीक हैं, जिन्होंने अपनी प्राण न्यौछावर करके हैफा शहर को उस्मानी तुर्कों से मुक्त कराया था। तीन मूर्ति भवन में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का आवास था। उनके बाद में उनकी स्मृति में इसे संग्रहालय के रूप में बदल दिया गया है। उनके जीवन की झलक आज भी यहाँ उनके छाया-चित्रों में देखी जा सकती है। सीढ़ीनुमा गुलाब उद्यान एवं एक दूरबीन यहाँ के प्रमुख आकर्षण हैं। इसी गुलाब उद्यान से नेहरू अपनी शेरवानी का गुलाब चुना करते थे।