घायल भारत चीख रहा है:- कविता

घायल भारत चीख रहा है:- कविता

अपूर्व गौरव शाह विक्रम की सबसे प्यारी कविता

मोहब्बत रहमान किसी का तो कुछ भगवान लिखते हैं ,
मिटा हस्ती अपने इश्क को अपनी पहचान लिखते हैं ,
मगर हम तलवारों के बेटे और मस्तानों की टोली जो वह आकर खून सरहद पर अपने हिंदुस्तान लिखते हैं!!

तू हास्य की भाषा नहीं लिखा हूं ,

नाही ग़ज़ल सुनाता हूं मुझे कविता लिखना नहीं आता बस चीखे लिखता जाता हूं ,

देश मेरा जल रही है आग लगी है सीने में ,

हुक्मरा व्यस्त दिखे हैं खून गरीब के पीने में ,

तो राम मंदिर या बाबरी मस्जिद का पक्ष नहीं मैं लाया हूं, घायल भारत चीख रहा है बस चीख सुनाने आया हूं !!

फिर पिता को ठेस पहुंची फिर बेटा नादान हुआ है ,

फिर फिरौन ने सीमा लांघी भस्मासुर को अभिमान हुआ है ,

तो फिर और फिरौनियत को फिर मिटाने मूसा हृदय क्षेत्र खुले ,

और भस्मासुर मगरूर हुआ शिव का तीसरा नेत्र खुले!!

एहसास नहीं है भारत को जज़्बात कैद है पाकिस्तान ,

दो बच्चे के सिर सहलाते दो हाथ कैद है पाकिस्तान में ,

जल सेना के स्वाभिमान का गुमा कह दे पाकिस्तान में , अब्दुल कलाम आजाद का हिंदुस्तान कैद है पाकिस्तान में ,

एक मां के मुंतजीर आंख का नूर कैद है पाकिस्तान में , सिर्फ कुलभूषण नहीं किसी मांग का सिंदूर कह दे पाकिस्तान में!!

शांति श्वेत परचम अपना देख गिरा यू भू पर है ,

अब तो जागो संसद वालों पानी सर के ऊपर है ,

या दुश्मन रख से स्नान करो या शर्म करो विषपान करो , कुलभूषण को रिहा कर आओ या जंग का ऐलान करो !!

भूल गए कृपया हमारी कितनी भूमि छोड़ी है ,

एलओसी कि आगे चलकर सेना अपनी मोरी है ,

हर युद्ध हराये तुम को क्षमादान तुम भूल गए ,

1947 में किया जो भूमि दान तुम भूल गए ,

गुट्टो के पहले हाथों को हमने भीक्षा दी है जी ,

देखे को अनदेखा करके जहर के गुटकी पी है जी ,

ताज धमाके जैसे कितने जख्मों को झेला हमने ,

फिर भी मैदानों में तुमसे क्रिकेट मैच भी खेला हमने , कश्मीर समस्या हमने छाती पर ले रखी है जी ,

पीओके के नाम के दौलत भीख में दे रखी है जी ,

अपने अग्नि शस्त्रों की चीख दबा रखी है जी ,

और अश्वमेघ के घोड़े पर लगाम लगा रखी है जी !!

तुम भूल रहे हो शीशे से पत्थर नहीं तोड़ा जाता , 93 हजार छोड़े हमने तुमसे एक नहीं है छोड़ा जाता !!

फांसी रुकवा ली है हमने हर्ष पखवारे नहीं मिले , पाकिस्तानी सलाह देने वाले अंगारे नहीं मिले ,

वह आईएसआई के दफ्तर में तो हंसता सावन आता होगा ,

रणविजय उसका मुस्कान लिए खिलकर रावण आता होगा ,

और यहां पर एक अभागन सूखी रोटी सेक रही है 3 दिवाली से बुढ़ि आंखे राह कुलभूषण की देख रही है !!

प्रताड़ित करने वाले सारे उसे बेकार समझते होंगे ,

70 वर्षों के जख्मों को एक उपचार समझते होंगे ,

सोचते होंगे तबीयत नासाज बनाकर छोड़ेंगे ,

फिर दूजा सरजीत यमराज बनाकर छोड़ेंगे ,

क्या सोचते हैं हंसी ठिठोली वाली बात है कुलभूषण , भगौलीक फुटपाथ वाले लाचार अनाथ है कुलभूषण ,

अरे नशा उतरा पाकिस्तान का वह मदमस्त होकर बैठा है , अनाथ नहीं है कुलभूषण वह भारत मां का बेटा है !!

ऐसा ना हो मां तरपे खुद विवाद करने निकल पड़े ,

काली का वह रूप धरे तो खप्पर भरने निकल पड़े ,

ऐसा ना हो जन गण मन गूजराती के दरबारों में ,

और हम तिरंगा लहरा दे रावलपिंडी के चौबारे में !!

पहुंच दो उस मां के आंसू या इमरान तलक प्रस्थान करो , कुलभूषण को रिहा कर आओ या जंग का ऐलान करो !!

पुनर लंकेश ने जब कील वक्ष पर ठोका है ,

राम धनुष की प्रत्यंछा को चढ़ने से क्यों रोका है ,

प्रकांड ज्ञानियों को भी जब धर्म याद ना पड़ता है ,

तब बात साधना पड़ता है फिर बांध साधना पड़ता है , करपौरस अहिंसक होता तो सिकंदर सेना मुरती क्या , राणा प्रताप संत होते तो नींद अपनी पुगती क्या ,

57 से अंग्रेज रुलाये सिंह हासिनी के वार ने,

महाशुर के सर ऊंचा रखा टीपू की तलवार ने ,

औरो ने भी आवेशों में बागी गोली चलाई थी ,

भगत सिंह के विस्फोटों ने गोवि नहीं बनाई थी!!

मौसम हो जो हंसने का तो बरमबार हंस आऊंगा ,

जुल्फ लिखूंगा कजरारे और चाल ढाल मदमस्त लिखूंगा , धड़कन किसी के नाम सदा और यौवन का एहसास लिखूंगा ,

पर भारत मां का दर्द हुआ तो चीखूंगा चिलाऊंगा ,

गली गली में घूम घूमकर मां के पीड़ा सुनाऊंगा ,

और शमशीर बनाकर कलम को अपने ,

तिरंगे का जाएगा लिखूंगा ,

और दुश्मन की छाती पर बैठकर जय जय हिंदुस्तान लिखूंगा !!

ये कविता कवि अपूर्व विक्रम शाह की है !!