गणतंत्र दिवस : भारत का लोकतान्त्रिक पर्व

गणतंत्र दिवस : भारत का लोकतान्त्रिक पर्व

आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !!

आज हमारे देश में गणतन्त्र लागू ७३ वर्ष हो चुके हैं . ये वक़्त है खुद के मूल्यांकन का , राष्ट्र के प्रगति के मूल्यांकन का . हमारे राष्ट्र के मूल में संविधान है , जिससे हमारा देश चलता है . जो सभी नागरिकों को समान अधिकार , स्वंतन्त्रता , समानता प्रदान करता है . लेकिन क्या ये अधिकार सभी को समान रूप से मिले हुए है , ये अभी भी प्रश्नवाचक है .  6 दिसंबर 1946 को जब संविधान सभा की स्थापना हुई थी तो लोगों ने भारत को फिर से विश्वभारती बनाने का सपना देखा था , छुआछूत के निर्मूलन का सपना देखा था , खुद को सडक से संसद तक पहुचने का सपना देखा था , सडक , बिजली , रोजगार के समान अवसर प्राप्त करने का सपना देखा था . क्या ये सब पुरे हुए ?

हमारा देश साइकिल से राकेट ले जाने से लेकर वर्तमान में मंगल तक पहुच चूका है . हमारा देश पिछले 10 वर्षों से खुद को अग्रणी राष्ट्रों में शामिल करने को लेकर काफी मेहनत कर रहा , चाहे वों फार्मास्यूटिकल क्षेत्र हो , या अन्तरिक्ष क्षेत्र हो , या मार्गों के जरिये राष्ट्र को जोड़ने का काम हो , या हवाई मार्गों को आम जनता तक सुलभ करवाने का काम हो , या covid – 19 जैसी आपदा से बचने को लेकर किया गया काम हो .

वर्तमान में, भारत विश्व स्तर पर जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा प्रदाता है। भारतीय फार्मा कंपनियां विभिन्न टीकों की वैश्विक मांग के आधे से अधिक को पूरा करती हैं, साथ ही अमेरिका में 40 प्रतिशत जेनेरिक दवाओं की मांग को पूरा करती हैं। covid – 19 में हमारे देश ने आपदा को अवसर में बदलने का काम किया , प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आत्मनिर्भर का नारा देकर इतनी विशाल वाली जनसख्या वाली देश को स्वदेशी टिका बनाने का कार्य दिया , जो पहले सपना लगता था वो अब हकीकत था . अब हमें किसी राष्ट्र पर निर्भर रहने की कोई आवश्यकता नहीं थी , हमने इस माहामारी में ७० से जयादा देशो को मुफ्त वैक्सीन देने का काम किया . ये देश की उन्नति को दर्शाता है .

इसरो ने जिस तरह से कम समय में अपने आपको अन्तरिक्ष क्षेत्र में साबित किया है , वों देश की प्रगति को दर्शाता है . चाहे पहली ही बार में मंगल तक पहुचने का कीर्तिमान स्थापित करना हो या , चाँद के अदृश्य हिस्से में रोवर उतारने का कठिन संकल्प इसरो ने देश को एक नयी प्रधोगिकी पहचान दी है . दुनिया के दुसरे देश भी हम से अपना उपग्रह अन्तरिक्ष में भेजते है , ये गर्व और नए भारत की धमक है . २०२२ में हम स्वदेशी तरीकों से मानव मिशन अन्तरिक्ष भेज रहे हैं . इन पहलूवों को नजरंदाज़ नहीं किया जा सकता .

आज हमारा देश राज्य राजमार्ग , राष्ट्रिय राज्यमार्ग , स्वर्णिम चतुर्भुज हो या एक्सप्रेसवे या सुदूर लद्दाख में सडक बनानी हो सक्षम है . पहाड़ों का सीना चीरकर उसमे से सुरंगे बनानी हो हम सक्षम है . ये हमारे देश की उपलब्धि को दर्शाता है .

लेकिन इन सब उपलब्धियों में कहीं न कहीं हम आज भी समानता नहीं ले आ पाए . गरीब और गरीब हो रहे हैं , अमीर और अमीर हो जाते रहे हैं . देश की संसद में अपराधिक व्यक्तियों का बोलबाला होता जा रहा है . क्या ये उपलब्धी है ? हमने देखा की कैसे पिछले वर्ष की covid महामारी में गरीबों को ऑक्सीजन तक नसीब नहीं हो रहे थे , वही कुछ बेगैरत लोग इसकी कालाबाजारी कर रहे थे . हॉस्पिटल तो छोडिये श्मसान तक नसीब नहीं हुआ इन लोगों को . गंगा के रेत के टिल्लों में शव दफनाये जा रहे थे , क्या ये उपलब्धि है ? मास्क , दवा और वैक्सीन के नाम कितने ही घोटाले हुए उन सबका क्या ? बेचारे उन मरने वाले परिजनों का क्या ? कौन जवाबदेही है इसका , सरकार या हमलोग जो डकैतों को संसद में भेज रहे हैं ? जाति , पैसे और शराब के एक पैग पर अपना वोट कुछ चोर और डकैतों को डाल आते हैं , इस पर कभी हमें नहीं सोचा है ? संसद में आम आदमी का बेटा अब नहीं जा सकता क्योंकी यहाँ तो नेता खुद भाई – भतीजा को हमारे लिए चुनते हैं , और हम मूँह उठाकर उन्हें वोट देने चले जाते है . कभी सोचा की चांदी का चमच लेकर पैदा होने वाला आपके बारे में क्या सोचेगा , उसके लिए तो सब धान बाईस पसेडी है . 05 वर्षों तक सत्ता का भोग करने के बाद उसे याद आती है जनता की , लोकतंत्र की . ऐसे गणतन्त्र की कामना तो गांधी जी , नेहरु और पटेल ने भी नहीं की होगी . जहाँ मात्र ०६ से ०७ % आम आदमी ही सत्ता के भागीदार बन पाता है , संसद पहुच पाता है . बाकी सब चान्दी का चमच लेकर पैदा हुए मतलब राजनितिक घराने से हैं . ये गणतन्त्र है ? लेकिन हमें क्या , हमें तो वोट के दिन अपने जात के नेता पर वोट देकर आ जाना है , उसके बाद वो कभी पूछने भी ना आये . ये लोकतंत्र है ? बात इतनी तक नहीं है , २०१९ लोकसभा में पहुचे ५३९ सांसदों में से २३३ सांसदों पर अपराधिक मुकदमें दर्ज हैं . सीधा अर्थों में ४४ % से भी ज्यादा सांसद किसी न किसी अपराध में संलिप्त हैं . और हम उनसे आशा करते है , अपराध रोकने का . देश की राजधानी दिल्ली भी बेटियों के लिए सुरक्षित नहीं , निर्भया को कौन भूल सकता है ? और हम इनसे आशा करते है अपराध पर रोकथाम लगाने के . पिछले ही वर्ष हाथरस में जो हुआ , इस वर्ष राजस्थान में बेटियों के साथ हुआ , कर्नाटक में जो लवन्या के साथ हुआ , हमारे देश के सताधिशों ने इस पर रोक लगाने की कोशिश तक ना की . जहाँ हमारा देश प्रगति के क्षेत्र में मंगल तक पहुच चूका है वही , अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया इसे रैप कैपिटल कहने से भी नहीं हिचकती . ऐसे देश का स्वप्न तो गांधीजी ने भी नहीं देखा था . ऐसे गणतन्त्र में जहाँ कानून भी अमीरों और पैसों वालों के इशारे पर चले , और गरीब उसी में पिश्ता रहे . ये कैसा लोकतंत्र है ?

जहाँ एक तरफ केन्द्रीय विश्वविध्यालय में पढाई का स्तर सर्वाधिक है तो वही बिहार जैसे बीमारू राज्यों में पढाई तो दूर की बात है , डिग्री मिलने में पांच साल लग जाते है . ( जिसका भुग्तभोगी मै खुद हूँ ) . शिक्षा का स्तर सही नहीं है , है भी तो रोजगार के अवसर समान रूप से उपलब्ध नहीं है , वैकेंसी निकली भी तो सही समय पर उसकी भर्ती परक्रिया ख़त्म नहीं होती , बिहार में २०१४ की निकली हुई भर्ती का अभी तक कोई सुचना नहीं है , परिणाम में हो रहे गड़बड़ियों पर जब छात्र आवाज़ उठाते है तो उन्हें घसीट घसीट कर मारा जाता है , आंसू गैस के गोले दागे जाते हैं . कुछ तथाकथित बुधजिवी लोग तो प्रतियोगी छात्रों को देशद्रोही लिखने में भी नहीं हिचकते , क्योंकी उनके लिए आसान है लिखना . लेकिन कभी उन्होंने सोचा है की बिहार के इन छात्रों पर क्या गुजरती होगी , माई – बाबूजी खेती , मजदूरी करके पढ़ाते है , गाँव से दूर एक छोटे से कमरे में अपने सपनों को कलम से बुन रहा होता है , जिसके पास बाहर जाने की समर्थता नहीं होती वो घर पर ही अपने सपनो को कलम से पूरा करने की जिद्द लिए दिन रात मेहनत करता है , की कुछ हो जाए . माई बाबूजी का सपना पूरा हो जाए . लेकिन लोग तो सवाल पूछते है की तुम सरकारी नौकरी छोड़कर managment ये सब क्यों नहीं करते , कैसे करें न कॉलेज में पढाई है , न समय पर एग्जाम , ना ही उतने पैसे ? ये गणतन्त्र है जहाँ एक तरफ अवसर है तो दूसरी तरफ बेरोजगार छात्रों की भीड़ . नेता , विधायक , सांसद इनको नहीं समझ पायेंगे . इस देश की उम्मीदों का भार युवाओं पर हैं , लेकिन दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश के पास इनके समस्याओं का समाधान नहीं हैं ? क्या यहीं गणतन्त्र है ?

मंगल पर पहुचना प्रगति की निशानी हो सकती है , लेकिन उनका क्या जो अभी भी छुआछुत के मारे हैं ? दलित के नाम पर वोट लेने के लिए उनके घर पर पहुच कर खाना खाने वाले नेताओं को कभी चुनाव के बाद इनकी सुध भी रही है . या सिर्फ मंदिर और मस्जिद करना ही इस लोकतान्त्रिक देश की प्रगति की निशानी रह गए है , जहाँ मुद्दों पर नहीं जिन्ना और पकिस्तान पर वोट डाले जाते हैं . कोई हिन्द्वों को अपनी 25 करोड़ आबादी से डराता है तो कोई मुस्लिमों को अपनी १०० करोड़ आबादी से . भारत ऐसा गणतंत्र नहीं हो सकता . हमने बदलाव तो बहुत कर लिए लेकिन मूलभूत बदलाव की जरूरत अभी भी है , जहाँ शिक्षा , रोजगार के अवसर सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध हो . बेटियां नारों में ही नहीं शहरों में भी सुरक्षित हों . ऐसे गणतन्त्र की हम कामना करते है और इसके लिए हम आवश्यक रूप से अपना अपना सहयोग भी देंगे , जिससे आगे जाकर कोई ये ना पूछे की , क्या यहीं गणतंत्र हैं ?