एक शायर

एक शायर

श से शायरी-शायरी के नाम लेते ही हम सबके जेहन में एक नाम गूंजने लगता है वह नाम है मिर्जा गालिब! मिर्जा गालिब नाम लेते ही शायरी का एक आसमान दिखने लगता है , ग़ज़ल का एक समुद्र दिखने लगता है ,शेरों का एक जंगल दिखने लगता है !यह बात सच है कि मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान को शायरी ने इज्जत , शोहरत दिया मिर्जा को गालिब बना दिया! लेकिन मिर्जा गालिब को साहित्य की दुनिया में आने से शायरी के अंदर एक नई रंग आ गई , ग़ज़ल को एक जहां मिल गया , शेर और नज्में खुशी से झूम उठे! क्यों की उन्हे मिर्जा गालिब मिल गया और खुशी भी क्यों ना हो जब ग़ालिब साहब लिखते हैं :-

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है ,
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

‘ग़ालिब’ बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे

ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे

दुश्मनों की महफ़िल में चल रही थी मेरे कत्ल की साजिश…
मैं पहुंचा तो बोलें यार तेरी उम्र बहुत लम्बी है !!

ग़ालिब की शायरी से तो मोहब्बत ही डगमगा जाती है ! जब ग़ालिब साहब लिखते हैं :

हमने मुहब्बत के नशे में आकर उसे खुदा बना डाला
होश तब आया जब उसने कहा की खुदा किसी एक का नहीं होता

एक दिन तो साहित्य की नगरी में सजदों पे सजदा होने लगा , हर तरफ खुशियों का रंग दिखने लगा जब ग़ालिब साहब लिखते हैं :-

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या हैतुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल

जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा कुरेदते हो जो अब राख जुस्तुजू क्या है!

हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता

वगरना शहर में ‘ग़ालिब’ की आबरू क्या है

ग़ालिब साहब जिस गली जिस कूचे से गुजरते थे एक रंग, एक महक छोड़ जाते थे !! मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी सुनकर तो गूंगे भी बोल पड़ते थे और एक वाह-वाह की आवाज गूँजने लगती थी!! साहित्य की नगरी होती भी ऐसी है ! यहां आह की जगह वाह- वाह निकलती है ! गालिब साहब के पास कितना भी दर्द सितम आ जाए लेकिन उनके लबों पर हमेशा एक प्यारी मुस्कान रहती थी !! वह गहरे विचार रखने वाले सच्चे और अच्छे व्यक्ति थे, मानो उनके अंदर ही श्री कृष्ण का दर्शन हो जाये!! भला एक व्यक्ति अपने बारे में इतना अच्छा शायरी कैसे लिख सकता है :-

तेरा इतना प्यार इतना अच्छा विचार ऐ गालिब हम तुझे वाली कहते अगर तू शराबी ना होता

नहीं होता एक शायर के अंदर अगर श्री कृष्ण का दर्शन हो जाए तो इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है!! एक साहित्यकार का जाने अनजाने में न जाने किस-किस से रिश्ता होता है!! कभी किसी की आंखों में आंसू देख ले तो उसके गम में टूटकर उसी कतरे में डूब जाए , किसी किसी कभी किसी के लबों पर मुस्कान तैरती मिल जाए , तो साहिल पर बैठा दीवाना बार बार ना जाने कब तक उसकी मुस्कान को तक तार है !! किसी अजनबी राहगीर के पैरों में छाले देख ले , तो वह जख्म अपने दिल पर महसूस करें और दीवानगी इस कदर कि अपनी तसल्ली के खातिर अपने तसल्ली के लिए उस मुसाफ़िर के जख्मों पर अपनी पलकें भी रख दें !! जिस गली से से भी गुजरे दरवेश की मनिंदा दुआओं की लोबान महकता चले!! इसके बरअक्स नाराजगी की शिद्दत भी ऐसी की दुनिया बनाने वालों से ही खफा हो जाए , भूख लगे तो खुदा से चांद सूरज को रोटी बना देने की जिद्द कर बैठे और मासूमियत की इंतहा या कि अपने ही कातिल के हाथ चूमकर दुआओं से नवाजें!! जन्नत और साहित्य में ज्यादा फर्क नहीं होता क्योंकि जन्नत में कभी गम नहीं मिलता और साहित्य में गम!! आते आते ही एक लोबान की महक बन जाती है मुझे एक शायरी याद आ रही है : मैं तो शायरी सुना कर शांत खड़ा रहा सब अपने अपने चाहने वालों में गुम हो गए !! अब आप ही बताइए हम उसे दर्द कैसे कहें , जिसे सुनाने के बाद सब वाह-वाह कहने लगे और अपने महबूबा की जुल्फों में गुम हो जाए !! अगर एक शायर को पढ़ना हैं तो आप महरूम डॉ. राहत इंदौरी को पढ़िए जिन्होंने इस दुनिया में एक ग़ज़ल का पेड़ लगाकर विदा हुए :-

मेरे हुजरे में नहीं और कहीं पर रख दो , आसमाँ लाए हो ले आओ ज़मीं पर रख दो , अब कहाँ ढूँढने जाओगे हमारे क़ातिल आप तो क़त्ल का इल्ज़ाम हमीं पर रख दो , मैं ने जिस ताक पे कुछ टूटे दिये रक्खे हैं चाँद तारों को भी ले जा के वहीं पर रख दो !!

सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए

ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए ,

मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया

इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए!!

एक शायर इतना बड़ा होता है कि आसमान को जमीन पर रखने की बात करता है और इतना नादान इतना मासूम होता है कि अपना ही कत्ल का इल्जाम खुद पर लेने के लिए तैयार हो जाता है !! ताकि सामने वाले को दुख ना लगे और इतना गहरा होता है कि जब समंदर को भी प्यास लगती है जब समुद्र को भी पानी की जरूरत पड़ती है , तो एक कतरा पानी के लिए आकर बिल बिललती है , आकर रोती है !! एक शायर डाली से पता नहीं तोड़ता , तोड़ने से पहले हाथ कांपने लगती है दिल की धड़कन तेज हो जाती है !! बागों से फूल नहीं तोड़ता , तो फिर वह भला किसी को दिल कैसे तोड़ेगा? और आखिर में बस इतना ही बोलेंगे कि :

बहुत सहा तूने दर्द ए ग़ालिब तुझे सलाम तुझे सलाम तुझे सलाम