दुर्गा पूजा

दुर्गा पूजा

दुर्गा पूजा (Durga Pooja) क्या है? क्यों मनाया जाता है? दुर्गा पूजा की शुरुआत कैसे हुई , दुर्गा पूजा कब मनाया जाता है? दुर्गा पूजा लेख इत्यादि सभी के बारे में जानेंगे।

दुर्गा पूजा एक पर्व ही नहीं बल्कि भारतीय सांस्कृतिक का अहम हिस्सा है। दुर्गा पूजा की प्रख्यात का पता इस प्रकार लगाया जा सकता है की कोई भी पर्व त्यौहार नहीं है जिसमे सरकारी दफ्तरों , स्कूलों में 5 दिनों तक छूटी मिले लेकिन दुर्गा पूजा (Durga Pooja) अर्थात् दशहरा में मिलता है। दुर्गा पूजा हिंदू धर्म वार्षिक उत्सव में से एक है , दुर्गा पूजा भारत के लगभग सभी राज्यों में अलग अलग प्रकार से बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है। माता की पूजा 10 दिनों तक लगातार चलता है , प्रत्येक दिन की अपनी अलग अलग महत्व है।

दुर्गा पूजा / दशहरा / नवरात्र क्या है?

दुर्गा पूजा , दशहरा तथा नवरात्र तीनो नाम अलग अलग जरूर है पर अर्थ एक ही है दुर्गा मां की पूजा। दुर्गा पूजा एक हिंदू धर्म की सबसे बड़े पर्व में से एक है , जिसे मुख्यतः भारत के सभी राज्यों के साथ-साथ नेपाल तथा बांग्लादेश के हिंदुओं के द्वारा भी मनाया जाता है। इसमें मुख्य रूप से दुर्गा मां के अलग-अलग रूपों को 9 दिनों तक पूजा-अर्चना तथा उपासना किया जाता है , दसवे दिन विसर्जन होता है। पूजा , माता की प्रतिमा बनाकर तथा मंदिरों में स्थापित माता के प्रतिमा से होता है । माता , पूजा अर्चना का उपासना से खुश होकर भक्तों की कष्ट क्लेश हर लेती है तथा माता की सदैव कृपा बनी रहती है।

दुर्गा पूजा क्यों मनाया जाता हैं?

दुर्गा पूजा 19वीं सदी से ही मनाया जाता है। दरअसल महिषासुर नामक एक राक्षस था जो भगवान ब्रह्मा जी को तपस्या से खुश करके अमर होने का वरदान मांगा लेकिन ब्रह्मा जी के द्वारा अमर होने का वरदान मिला परंतु किसी स्त्री के हाथों वध होगा यह भी मिला यह वरदान पाकर महिषासुर खुश हो गया , उसे लगा कि मैं सचमुच में अमर हूं मुझे तो कोई नहीं मार सकता और कोई स्त्री मुझसे यूद्ध नहीं कर सकती । महिषासुर ने अपने सैनिकों को बुलाकर देवताओं से युद्ध करने के लिए निकल पड़ा , युद्ध हुआ और वह जीत भी गया और पाप की गंगा बहाने लगा , जिसके वजह से सभी देवताओं ने त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा , विष्णु तथा महेश के पास गए और इसका कोई उपाय पूछे तब त्रिदेव के द्वारा माता दुर्गा जी का निर्माण किया गया और माता ने महिषासुर से युद्ध करके उसका वध कर दिया जिससे बुराई पर अच्छाई की जीत हुई , सत्य के सामने असत्य की हार हुई। इसी के शुभ अवसर पर माता की पूजा आराधना किया जाता है।

दुर्गा पूजा कब मनाया जाता है?

दुर्गा पूजा हिंदू पंचांग के अनुसार सितंबर अक्टूबर महीने में मनाया जाता है। यह वार्षिक होता है।

दुर्गा पूजा की शुरुआत कलश यात्रा के साथ

पहला दिन माता की पूजा का शुभारंभ कलश यात्रा के साथ किया जाता है जिससे हिंदू धर्म में शुभ माना जाता है। कलश यात्रा के समय दुर्गा माता का आवाहन कर बुलाया जाता है , कलश यात्रा में कलश (मिट्टी का बना हुआ) में जल भरकर लाया जाता है तथा माता के पास जौ (जई) के साथ स्थापित किया है।

माता का नयन खुलना

दुर्गा माता की नयन षष्ठी या सप्तमी को शुभ मुहूर्त पर खुलता है , इसके पहले प्रथम से पंचम तक ढका हुआ होता है इसका अलग ही अपनी महत्वपूर्णता है।

विजय दशमी

मुख्य रूप से पूजा माता की आंख खोलने के पश्चात ही जोर-शोर से शुरू होता है। सप्तमी , अष्टमी तथा नवमी तक पूजा चलता है , दसवीं को हवन होता है तथा पूजा का समापन भी होता है इसी के साथ माता की प्रतिमा को विसर्जित किया जाता है।

कार्यक्रम

दुर्गा पूजा में माता की पूजा के साथ साथ कार्यक्रम भी जोर शोर से चलता है। बहुत बड़े-बड़े पंडाल का निर्माण किया जाता है आधुनिक तरीके से माता की प्रतिमा को स्थापित किया जाता है। सजावट में तो प्रथम स्थान मिलता है दुर्गा पूजा को बाकी सब पर्व त्योहारो से। दुर्गा पूजा में प्रदर्शनी का भी आयोजन होता है।यदि कुछ ज्यादा न हो तो प्रदा पर रामायण तो जरूर चलता है।

दुर्गा पूजा की शुरुआत

दुर्गा पूजा की शुरुआत ब्रिटिश राज्य में ही पश्चिम बंगाल से शुरू हुआ था। हिंदू सुधारकों के द्वारा इसको व्यापकता मिली जिसे धीरे-धीरे बिहार , उत्तर प्रदेश , झारखंड , दिल्ली , तमिलनाडु , गुजरात , केरल , महाराष्ट्र लगभग भारत के सभी राज्यों में व्यापकता हुई। दुर्गा पूजा को अलग-अलग नाम जैसे शरदकालीन पूजा , महापूजा , कुल्लू दशहरा ,मैसूर दशहरा तमिलनाडु में बोमाई गोलू , आंध्रप्रदेश में कोलुबू से जानते है।

मंत्र

ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।