बटला हाउस एनकाउंटर

बटला हाउस एनकाउंटर

आज से ठीक 13 साल पहले यानी आज ही के दिन दिल्ली का बाटला हाउस इलाका गोलियों की आवाज़ से गूंज उठा था. किसी को अंदाजा भी नहीं था कि उस इलाके में होने वाली मुठभेड़ पूरे देश में चर्चा का विषय बन जाएगी. दिल्ली का एक जांबाज़ इंस्पेक्टर अचानक शहीद हो जाएगा. मगर ऐसा ही हुआ. कुछ देर बाद वो इलाका पूरे देश में सुर्खियां बन गया. देश के हर टीवी न्यूज चैनल पर केवल बाटला हाउस की ख़बर थी. हर कोई जानना चाहता था कि आखिर वहां हुआ क्या है.

दरअसल, इस एनकाउंटर की कहानी 13 सितंबर 2008 को दिल्ली के करोल बाग, कनाट प्लेस, इंडिया गेट और ग्रेटर कैलाश में हुए सीरियल बम ब्लास्ट से शुरू होती है. उस ब्लास्ट में 26 लोग मारे गए थे, जबकि 133 घायल हो गए थे. दिल्ली पुलिस ने जांच में पाया था कि बम ब्लास्ट को आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन ने अंजाम दिया था. इस ब्लास्ट के बाद 19 सितंबर को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल को सूचना मिली थी कि इंडियन मुजाहिद्दीन के पांच आतंकी बटला हाउस के एक मकान में मौजूद हैं. इसके बाद पुलिस टीम अलर्ट हो गई.

19 सितंबर 2008 की सुबह आठ बजे इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की फोन कॉल स्पेशल सेल के लोधी कॉलोनी स्थित ऑफिस में मौजूद एसआई राहुल कुमार सिंह को मिली. उन्होंने राहुल को बताया कि आतिफ एल-18 में रह रहा है. उसे पकड़ने के लिए टीम लेकर वह बटला हाउस पहुंच जाए. राहुल सिंह अपने साथियों एसआई रविंद्र त्यागी, एसआई राकेश मलिक, हवलदार बलवंत, सतेंद्र विनोद गौतम आदि पुलिसकर्मियों को लेकर प्राइवेट गाड़ी में रवाना हो गए.

इस टीम के इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा डेंगू से पीड़ित अपने बेटे को नर्सिंग होम में छोड़ कर बटला हाउस के लिए रवाना हो गए. वह अब्बासी चौक के नजदीक अपनी टीम से मिले. सभी पुलिस वाले सिविल कपड़ों में थे. बताया जाता है कि उस वक्त पुलिस टीम को यह पूरी तरह नहीं पता था कि बटला हाउस में बिल्डिंग नंबर एल-18 में फ्लैट नंबर 108 में सीरियल बम ब्लास्ट के जिम्मेदार आतंकवादी रह रहे थे. उनका कहना है कि यह टीम उस फ्लैट में मौजूद लोगों को पकड़ कर पूछताछ के लिए ले जाने आई थी. जानिए क्या हुआ था उस दिन.

पुलिस का दावा है कि इसी मकान में दिल्ली धमाकों की साजिश रची गई थी!

सुबह 10:55 बजे

एसआई धर्मेंद्र कुमार फोन कंपनी के सेल्समैन का लुक बनाए हुए थे. वह लैदर शूज पहन कर और टाई लगाए हुए थे. खुद को फोन कंपनी का एग्जेक्यूटिव बताते हुए वह फ्लैट के गेट खटखटाने लगे. अंदर सन्नाटा छा गया. बाकी पुलिस वाले नीचे इंतजार कर रहे थे. इसी बीच इंस्पेक्टर शर्मा सीढ़ियां चढ़ने लगे. दो पुलिसकर्मी नीचे खड़े रहे.

सुबह 11:05 बजे

पुलिस वालों ने ऊपर जाकर देखा कि सीढ़ियों के सामने इस फ्लैट में दो गेट हैं. उन्होंने बाईं ओर वाला दरवाजा अंदर की ओर धकेल दिया. पुलिस वाले अंदर घुस गए. उन्हें अंदर चार लड़के नजर आए. वह थे आतिफ अमीन, साजिद, आरिज और शहजाद पप्पू. सैफ नामक एक लड़का बाथरूम में था. दोनों ओर से धड़ाधड़ फायरिंग होने लगी.

सुबह 11:10 बजे

दोनों तरफ से फायरिंग खत्म हो चुकी थी. इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा को दो गोलियां लगी. हवलदार बलवंत के हाथ में गोली लगी. आरिज और शहजाद पप्पू दूसरे गेट से निकल कर भागने में कामयाब रहे. गोलियां लगने से आतिफ अमीन और साजिद की मौत हो गई. फायरिंग सुनकर लोग सीढ़ियों से नीचे भागने लगे. इसका फायदा उठाकर आरिज और शहजाद भी भाग गए.

सुबह 11:13 बजे

इसी बीच पुलिस ने दो आतंकियों को भागते समय गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद ओवेस मलिक नामक एक शख्स ने 100 नंबर पर फोन करके फायरिंग की खबर दी. पीसीआर से जामिया नगर पुलिस चौकी को इस एनकाउंटर की खबर मिली. मेसेज फ्लैश कर दिया गया.

सुबह 11:20 बजे

महज 10 मिनट के अंदर इस गोलीबारी की खबर इलाके में फैल गई. इस मौके पर भारी भीड़ जमा हो गई. पुलिस भी भारी तादाद में पहुंच गई. उस फ्लैट को सील कर दिया गया.

शाम 5 बजे

होली फैमिली हॉस्पिटल में इलाज के दौरान इंस्पेक्टर शर्मा का निधन हो गया. इंस्पेक्टर शर्मा ने अपनी 21 साल की पुलिस की नौकरी में 60 आतंकियों को मार गिराया था, जबकि 200 से ज्यादा खतरनाक आतंकियों और अपराधियों को गिरफ्तार भी किया था, लेकिन बटला हाउस का यह एनकाउंटर आखिरी साबित हुआ.

13 सितंबर, 2008

दिल्ली के करोल बाग, कनाट प्लेस, इंडिया गेट और ग्रेटर कैलाश में पांच सिलसिलेवार बम धमाके हुए. इनमें 26 लोग मारे गए. सैकड़ों लोग घायल हुए.

19 सितंबर, 2008

दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा के नेतृत्व में विशेष टीम और जामिया नगर के बटला हाउस के एल-18 मकान में छिपे इंडियन मुजाहिद्दीन के आतंकवादियों में मुठभेड़ हुई. पुलिस ने दावा किया कि मुठभेड़ में दो आतंकी मारे गए, दो गिरफ्तार किए गए और एक फरार हो गया.

मुठभेड़ में घायल इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा को होली फैमिली अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां आठ घंटे इलाज के बाद उनकी मौत हो गई. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक, उन्हें पेट, जांघ और दाहिने हाथ में गोली लगी थी. उनकी मौत खून बहने के कारण हुई. पुलिस ने उनकी मौत के लिए शहजाद को जिम्मेदार ठहराया.

21 सितंबर, 2008

पुलिस ने कहा कि उसने इंडियन मुजाहिदुदीन के तीन कथित आतंकियों और बटला हाउस के एल-18 मकान की देखभाल करने वाले व्यक्ति को गिरफ्तार किया. दिल्ली में हुए विस्फोटों के आरोप में पुलिस ने कुल 14 लोग गिरफ्तार किए गए हैं, जो दिल्ली और यूपी के है. मानवाधिकार संगठनों ने एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए जांच की मांग की.

21 मई, 2009

दिल्ली हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से पुलिस के दावों की जांच कर दो महीने में रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा.

22 जुलाई, 2009

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने दिल्ली हाईकोर्ट के सामने अपनी रिपोर्ट पेश की. रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट दी गई.

26 अगस्त, 2009

दिल्ली हाईकोर्ट ने एनएचआरसी की रिपोर्ट स्वीकार करते हुए न्यायिक जांच से इनकार कर दिया.

30 अक्टूबर, 2009

हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई, लेकिन उसने भी इंकार कर दिया.

19 सितंबर, 2010

बटला हाउस एनकाउंटर के दो साल पूरे होने पर दिल्ली की जामा मस्जिद के पास मोटर साइकिल सवारों ने विदेशी पर्यटकों पर गोलीबारी की. इसमें दो ताइवानी नागरिक घायल हुए.

6 फरवरी, 2010

पुलिस इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा की मौत के सिलसिले में पुलिस ने शहजाद अहमद को गिरफ्तार किया.

20 जुलाई, 2013

अदालत ने शहजाद अहमद के मामले में सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित किया.

25 जुलाई, 2013

अदालत ने शहजाद अहमद को दोषी करार दिया.

30 जुलाई, 2013

अदालत ने शहजाद अहमद को उम्रकैद की सजा दी.

24 मई, 2016

आतंकी संगठन आईएसआईएस की ओर से जारी एक वीडियो में दो संदिग्‍ध आतंकी आतंकी अबु राशिद और मोहम्‍मद साजिद नजर आए. राशिद बटला हाऊस एनकाउंटर के बाद से फरार है, जबकि साजिद अहमदाबाद और जयपुर ब्‍लास्‍ट में शामिल था. दोनों साल 2008 के बाटला हाऊस कांड के बाद से फरार चल रहे हैं.

13 फरवरी, 2018

स्पेशल सेल ने फरार चल रहे आतंकी आरिज खान को नेपाल-भारत सीमा के पास से गिरफ्तार किया गया था। 

8 मार्च, 2021

साकेत कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संदीप यादव ने आरिज खान को दोषी ठहराया।

15 मार्च, 2021

साकेत कोर्ट ने दोषी आरिज खान को फांसी की सजा, 10 लाख का जुर्माना भी

कौन है आरिज़ ख़ान?

आरिज़ ख़ान उर्फ जुनैद का घर उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ में है. आरिज़ की स्कूल की पढ़ाई भी वहीं हुई है.

आरिज़ ख़ान के वकील एमएस ख़ान बताते हैं कि आरिज़ के घर में एक मां और एक भाई हैं. उन्होंने पहले बीटेक में एडमिशन लिया था. बाद में बीटेक छोड़कर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए दिल्ली आ गए थे और अपने मामा के यहां रह रहे थे.

दिल्ली पुलिस के मुताबिक वह 2008 में हुए दिल्ली बम विस्फोट मामले में भी अभियुक्त हैं. इस मामले की सुनवाई चल रही है.

आरिज़ ख़ान बटला हाउस मुठभेड़ के दौरान फ्लैट से भाग निकले थे. लेकिन, बाद में दिल्ली पुलिस ने उसे भारत-नेपाल सीमा पर पकड़ा था.

पुलिस के मुताबिक कस्टडी के दौरान 28 फरवरी, 2018 को आरिज़ खान ने अलीगढ़ से रामपुर जाने वाली रोड पर बरोटा गांव में ऊपरी गंगा नहर के पुल पास वो जगह भी दिखाई थी जहां हथियार छुपाए थे.

कोर्ट ने क्या कहा?

आरिज़ ख़ान को लेकर फ़ैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि ये साबित होता है कि आरिज़ खान और उनके साथियों ने पुलिस अधिकारियों की हत्या की थी और उन पर गोलियां चलाई थीं.

वेबसाइट लाइव लॉ के मुताबिक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संदीप यादव ने सजा सुनाते हुए कहा, “दोषी के घृणित कृत्य के कारण उनके जीने का अधिकार ख़त्म हो गया है… ये निष्कर्ष निकाला गया है कि ये रेयरेस्ट ऑफ द रेयर मामला है जिसके लिए दोषी क़ानून के तहत अधिकतम सज़ा का हकदार है. इस अपराध के पीछे की क्रूरता का परिमाण, स्तर, गलत काम करने वाली की मानसिकता और रवैये के साथ अन्य कारक इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस बनाते हैं.”

“समाज की रक्षा करना और अपराधी को डराना क़ानून का एक स्वीकृत प्रयोजन है और इसे उचित सज़ा द्वारा प्राप्त करना आवश्यक है. अरिज़ ख़ान जैसे दोषी के लिए सबसे उपयुक्त सज़ा मृत्युदंड होगी.”

कोर्ट ने ये भी कहा, “हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि एके-47 और दो पिस्टल जैसे जानलेवा हथियार फ्लैट से मिले हैं. बचाव पक्ष ये स्पष्ट करने में सक्षम नहीं रहा कि ये जानलेवा हथियार दोषी और उसके साथियों ने किस उद्देश्य से फ्लैट में रखे थे. ये हथियार किस तरह की तबाही मचा सकते थे इसे देखते हुए ये निष्कर्ष निकालना सही है कि ये हथियार आतंकी और गैर-सामाजिक गतिविधियों में शामिल होने के विचार से फ्लैट में रखे गए थे.”

कोर्ट ने आरिज़ ख़ान को अलग-अलग धाराओं में सज़ा दी है जिनमें करावास और जुर्माना भी शामिल हैं. सभी सज़ा एक के बाद एक चलेंगी.

सज़ा पर बहस करते हुए दिल्ली पुलिस के अतिरिक्त लोक अभियोजक एटी अंसारी ने कहा कि यह कोई सामान्य मामला नहीं है. यह अपनी ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मी की हत्या का मामला है. इसलिए दोषी को फांसी दी जानी चाहिए.

हालांकि, आरिज़ ख़ान के वकील एमएस ख़ान ने फांसी की सजा का विरोध किया है.

उनका कहना है, “पहले तो हमारा ये कहना था कि शहजाद और आरिज़ ख़ान को इस मामले में अभियोजन पक्ष ने एक जैसी भूमिका दी है. अब शहजाद को उम्रकैद मिली है तो समानता के आधार पर आरिज़ को भी उसी तरह की सज़ा मिलनी चाहिए. दूसरी बात ये थी कि इन अभियुक्त ने पूर्व नियोजित तरीक़े से हमला नहीं किया. उन्हें ना पुलिस के आने की जानकारी थी और ना ही उन्होंने प्लानिंग की थी. वो सब अचानक हुआ. साथ ही इस बात को लेकर भी स्पष्टता नहीं है कि मोहन चंद शर्मा को किस की गोली लगी थी.”

एमएस ख़ान ने बताया कि वो फांसी की सज़ा के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में अपील करेंगे.

राजनीति और कई सवाल

इस मुठभेड़ पर जहां मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाए थे वहीं राजनीति भी शुरू हो गई थी.

पुलिस जांच में खामियों की बात कही गई थी. मोहन चंद शर्मा के बुलैट प्रूफ जैकेट ना पहनने और अन्य पुलिसकर्मियों के पास बंदूक ना होने पर सवाल उठे थे.

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने दावा किया था कि ये मुठभेड़ फ़र्ज़ी थी. 2012 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने आज़मगढ़ पहुंचकर इस मुठभेड़ में मारे गए लोगों को न्याय दिलाने का वादा किया था.

समाजवादी पार्टी ने भी मामले की न्यायिक जांच कराने की मांग की थी. साल 2009 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को इस मामले की जांच करने के आदेश दिए थे. दो महीने बाद जुलाई 2009 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि मुठभेड़ असली थी और पुलिस की कार्रवाई नियमों के मुताबिक़ थी.

तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भी दिग्विजय सिंह के दावों को ख़ारिज कर दिया था. कुछ मुसलमान सांसदों ने मामले की जांच की मांग की थी जिस पर चिदंबरम ने कहा था कि मुठभेड़ असली थी. उन्होंने साथ ही कहा था कि मामले की दोबारा जांच की कोई ज़रूरत नहीं है.

ये मुठभेड़ आने वाले चुनावों में भी गर्म रहा. वर्ष 2012 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद के उस बयान को लेकर भी खूब विवाद हुआ था जिसमें उन्होंने कहा था कि बाटला हाउस एनकाउंटर में मृत लड़कों की तस्वीरें देखकर सोनिया गांधी की आंखों में आंसू भर आए और उन्होंने पीएम से बात करने के लिए कहा.

हालांकि, बाद में दिग्विजय सिंह ने कहा था कि सोनिया गांधी नहीं रोईं थीं.

साल 2008 में केंद्र और राजधानी दिल्ली में कांग्रेस की ही सरकार थी.

आरिज़ ख़ान पर फ़ैसला आने के बाद बीजेपी ने कांग्रेस के इसी बयान को लेकर फिर से निशाना साधा है. केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा था कि सोनिया गांधी, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी और दिग्विजय सिंह ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़े किए थे और आतंकियों का पक्ष लिया था.

उन्होंमे कहा था, “मैं मांग करता हूं कि उन्हें देश से माफ़ी मांगनी चाहिए.”

न्यायिक जांच की मांग

इस दौरान मानवाधिकार संगठनों ने बाटला हाउस मुठभेड़ को फर्ज़ी बताते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर करके मामले की न्यायिक जांच करने की मांग की थी.

इस पर 21 मई 2009 को दिल्ली हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को जांच कर दो महीने में रिपोर्ट देने के लिए कहा था.

इसके बाद 22 जुलाई 2009 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिल्ली हाईकोर्ट के सामने अपनी रिपोर्ट पेश की. रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट दी गई थी.

दिल्ली हाईकोर्ट ने 26 अगस्त 2009 को मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट स्वीकार करते हुए न्यायिक जांच से इनकार कर दिया था. इसी साल अक्टूबर में हाईकोर्ट के फैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई लेकिन वहां भी न्यायिक जांच से इनकार कर दिया गया.

इस मामले में शहजाद उर्फ पप्पू को जुलाई 2013 में आजीवन कारावास की सज़ा हो चुकी है.

इस मामले सज़ा सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट ने इस बात पर हैरानी ज़रूर जताई थी कि फायरिंग का ख़तरा जानते हुए भी पुलिसकर्मियों ने अपनी सुरक्षा पर ध्यान क्यों नहीं दिया. हालांकि, चाहे जो भी हो इससे उन्हें जांच करने आए पुलिसकर्मियों पर फायरिंग करने का अधिकार नहीं मिल जाता. उन्हें पुलिसकर्मियों का सहयोग करना चाहिए था ना कि उन पर हमला.