बैकुण्ठ शुक्ला : गद्दार फणीन्द्र घोष को मौत की नींद सुलाने वाले क्रांतिकारी

बैकुण्ठ शुक्ला : गद्दार फणीन्द्र घोष को मौत की नींद सुलाने वाले क्रांतिकारी

ये कहानी है उन अनसुने क्रांतिकारियों की जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व न्योछावर क्र दिया . फांसी के फंदे को भी चुमते हुए उस पे झूल गए . नमन है इस वीर को . वे आज़ादी के मतवाले थे और इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतू जान हथेली पर लेकर देश की स्वतंत्रता के आंदोलन में कूद पड़े. उन्होंने उस फणीन्द्र नाथ घोष को दिनदहाड़े बेतिया के मीना बाजार में कुल्हाड़ी से काट डाला जिसकी गवाही के आधार पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर लटका दिया गया था. इसी घोष की हत्या के आरोप में उन्हें अंग्रेज सरकार की तरफ से फांसी की सजा मिली.

सरकारी गवाह बन गये गद्दार फणीन्द्र नाथ घोष की बेतिया के मीना बाजार में हत्या कर भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु की मौत का बदला लेने वाले बैकुंठ शुक्ल को फांसी देने के वक्त गया जेल का सरकारी जल्लाद भी मानो थमक गया था। जेल के सुपरिंटेंडेंट मिस्टर परेरा रुमाल हिलाकर बार-बार संकेत दे रहे थे, पर उससे लीवर नहीं खींचा जा रहा था। शुक्ल जी ने जब चिल्लाकर कहा कि देर क्यों करते हो तो उसकी तंद्रा भंग हुई और उसने लीवर खींचा। उस दिन पूरे गारद में कोई चौकी नहीं गया, किसी ने भोजन नहीं किया, जेल का कोई मुलाजिम रोये बिना नहीं रहा। फांसी के दिन अलस्सुबह पांच बजे जब गया जेल के पंद्रह नंबर वार्ड से बैकुंठ शुक्ल फांसी स्थल की ओर जा रहे थे तो उनकी आखिरी आवाज थी – ‘अब चलता हूं।मैं फिर आऊंगा। देश तो आजाद नहीं हुआ । वंदेमातरम्…।

आरम्भिक जीवन :

बैकुंठ शुक्ल का जन्म 15 मई, 1907 को पुराने मुजफ्फरपुर (वर्तमान वैशाली) के लालगंज थानांतर्गत जलालपुर गांव में हुआ था. उनके पिता राम बिहारी शुक्ल किसान थे. गांव में ही प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने पड़ोस के मथुरापुर गांव के प्राथमिक स्कूल में शिक्षक बनकर समाज को सुधारना शुरू किया. 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय सहयोग दिया और पटना के कैम्प जेल गए. जेल प्रवास के दौरान वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के संपर्क में आए और क्रांतिकारी बने.

गद्दार से बदला :

1931 में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर षडयंत्र कांड में फांसी की सजा के एलान से पूरे भारत में गुस्से की लहर फ़ैल गयी. फणीन्द्र नाथ घोष, जो खुद रेवोल्यूशनरी पार्टी का सदस्य था, अंग्रेजी हुकूमत के दबाव और लालच में आकर वादामाफ़ गवाह बन गया और उसकी गवाही पर तीनों वीर क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई गई थी. इसी घोष को विश्वासघात की सजा देने का बीड़ा बैकुंठ शुक्ल ने उठाया और 9 नवंबर 1932 को घोष को मारकर इसे पूरा किया. उन्होंने उस फणीन्द्र नाथ घोष को दिनदहाड़े बेतिया के मीना बाजार में कुल्हाड़ी से काट डाला जिसकी गवाही के आधार पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर लटका दिया गया था. इसी घोष की हत्या के आरोप में उन्हें अंग्रेज सरकार की तरफ से फांसी की सजा मिली.

‘इस कलंक को धोओगे या ढोओगे : जिस फणीन्द्र नाथ घोष की गवाही पर सांडर्स मर्डर केस में भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में २३ मार्च १९३१ को फांसी दी गयी थी, उसकी मौत का फरमान पंजाब के क्रांतिकारियों ने कुछ यूं भेजा था-इस कलंक को धोओगे या ढोओगे? पंजाब से आये इस संदेश से बिहार के साथी विचलित थे। हाजीपुर सदाकत आश्रम में उनकी एक आपातकालीन बैठक हुई। इसमें मौजूद छह लोगों ने गोटी लगायी। गोटी इस बात पर कि आखिरकार फणीन्द्र नाथ घोष को खत्म कर भगत सिंह की मौत का बदला कौन लेगा। दरअसल, इस काम को करने के लिए हर कोई उतावला हो रहा था। यहां तक कि उस बैठक में मौजूद किशोरी प्रसन्न सिंह की पत्नी सुनीति जी इस बीड़े को उठाने के लिए मचल रही थीं।

अक्षयवट राय जी ने यह कहकर कि छह आदमियों के परिवार में सुनीति बहन अकेली महिला हैं और उनके चले जाने से परिवार ही सूना हो जायेगा, उनके प्रस्ताव का विरोध कर दिया था। वे खुद इस काम को अपने हाथ में लेना चाहते थे। अंत में गोटी लगाने पर एकराय कायम हुई। सुनीति जी ने ही पांच व्यक्तियों के बीच गोटी लगायी और गोटी से निकला बैकुंठ शुक्ल का नाम। बस क्या था? बल्लियों उछल गये बैकुंठ शुक्ल और लग गये अपने काम में। साथी बने चंद्रमा सिंह।

इस क़सम को पूरा करने की ज़िम्मेदारी योगेन्द्र शुक्ल के भतीजे बैकुंठ शुक्ल ने अपने कंधों पर ले ली. इनका साथ देने को चन्द्रमा सिंह तैयार हुए. 1932 में ही शीत ऋतु में हत्याकांड को अंतिम रूप देने का निर्णय लिया गया. 9 नवम्बर, 1932 को बेतिया के मीना बाज़ार के पश्चिमी द्वार पर पहुंच कर बैकुंठ शुक्ल और चन्द्रमा सिंह साईकिल से उतरे. एक पान गुमटी पर अपनी साईकिल खड़ी करके फणीन्द्र नाथ घोष की दुकान की ओर बढ़ गए।घोष के दुकान के आस-पास से भीड़ को हटाने के मक़सद से शुक्ल ने पटाखेनुमा हथगोला ज़मीन पर दे मारा. कर्णभेदी धमाका हुआ. धुंए के गुबार में कुछ भी देख पाना असंभव हो गया. इसी मौक़े का फायदा उठाते हुए शुक्ल ने खुखरी निकाल ली. उधर धमाका होते ही फणीन्द्र नाथ घोष भी सतर्क हो गया कि कहीं उसकी जान के दुश्मन बने इंक़लाबी तो नहीं पहुंच गए।उसने भी पिस्तौल निकाली, मगर उसे संभलने का मौक़ा दिए बग़ैर शुक्ल जी ने अपनी खुखरी से अंधाधुंध कई वार कर दिए. वार इतने जानलेवा थे कि घोष चीखें मारता ज़मीन पर लोट गया. बेतिया अस्पताल में क़रीब सप्ताह भर ज़िन्दगी व मौत के बीच जूझते हुए फणीन्द्र नाथ घोष की कहानी अब ख़त्म हो चुकी थी।

फणीन्द्र की मौत से ब्रिटिश सरकार की नींव हिल गयी थी। जोर-शोर से हत्यारों की तलाश शुरू हुई। मौके पर दोनों क्रांतिकारियों की जो दो साइकिलें पकड़ी गयी थीं, उनके कैरियर से प्राप्त गठरी में से धोती, छूरा, सेफ्टी रेजर, आईना और टार्च बरामद हुए थे। धोती पर धोबी का नंबर लिखा था, इससे पुलिस को रास्ता मिला और वह दरभंगा मेडिकल कालेज के छात्रावास में रहने वाले बैकुंठ शुक्ल के ग्र्रामीण गोपाल नारायण शुक्ल तक पहुंच गयी। गोपाल शुक्ल ने स्वीकार कर लिया कि 4 नवंबर को बैकुंठ शुक्ल छात्रावास आये थे और बताया था कि मोतिहारी जाना है। उन्होंने ही उनसे धोती, रेजर आदि सामान लिये थे।

क्योंकि मामला घोष जैसे सरकारी गवाह का था. पुलिस ने अपनी तफ़्तीश में ज़मीन-आसमान एक कर दिया. आख़िकार 5 जनवरी 1933 को चन्द्रमा सिंह कानपुर से जबकि बैकुंठ शुक्ल 6 जुलाई, 1933 को हाजीपुर पुल के सोनपुर वाले छोर से गिरफ़्तार कर लिए गए. मोतिहारी कोर्ट में मुक़दमा चला. सत्र न्यायाधीश ने 23 फरवरी 1934 को अपना फैसला सुनाया. चन्द्रमा सिंह को 10 साल का कारावास मिला और बैकुंठ शुक्ल को फांसी की सज़ा सुनाई गई।हालांकि इस फैसले के ख़िलाफ़ पटना हाईकोर्ट में अपील भी की गई, लेकिन यहां भी सज़ा को बरक़रार रखा गया. इस प्रकार बैकुंठ शुक्ल को गया सेन्ट्रल जेल में 14 मई 1934 को फांसी के तख्ते पर चढ़ा पर दिया गया. लेकिन अफ़सोस आज देश की कौन कहे बल्कि बिहार के युवा भी शायद बैकुंठ शुक्ल को जानते हों…सरकारी गवाह बन गये गद्दार फणीन्द्र नाथ घोष की बेतिया के मीना बाजार में हत्या कर भगत सिंह,सुखदेव व राजगुरु की मौत का बदला लेने वाले बैकुंठ शुक्ल को फांसी देने के वक्त गया जेल का सरकारी जल्लाद भी मानो थमक गया था। जेल के सुपरिंटेंडेंट मिस्टर परेरा रुमाल हिलाकर बार-बार संकेत दे रहे थे, पर उससे लीवर नहीं खींचा जा रहा था। शुक्ल जी ने जब चिल्लाकर कहा कि देर क्यों करते हो तो उसकी तंद्रा भंग हुई और उसने लीवर खींचा। उस दिन पूरे गारद में कोई चौकी नहीं गया, किसी ने भोजन नहीं किया, जेल का कोई मुलाजिम रोये बिना नहीं रहा। फांसी के दिन सुबह पांच बजे जब गया जेल के पंद्रह नंबर वार्ड से बैकुंठ शुक्ल फांसी स्थल की ओर जा रहे थे तो उनकी आखिरी आवाज थी :- 
अब चलता हूं।मैं फिर आऊंगा।देश तो आजाद नहीं हुआ। वंदेमातरम्…।

भारत सरकार ने योगेंद्र शुक्ला और बैकुण्ठ शुक्ला के सम्मान में डाक टिकट जारी किए थे

बैकुंठ शुक्ल की गया जेल में फांसी के दिन का विवरण प्रसिद्ध क्रांतिकारी विभूतिभूषण दासगुप्त की कालजयी बांग्ला पुस्तक ‘सेईं महावर्षार गंगा जल’ और इसके हिन्दी अनुवाद ‘सरफरोशी की तमन्ना’ नामक पुस्तक में मिलता है।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी